नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को उन याचिकाओं पर दोबारा विचार करने की मांग खारिज कर दी, जिनमें 20 जुलाई को Cockroach Janta Party (CJP) के प्रदर्शन में शामिल छात्र प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR की जांच कराने की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन में शामिल युवा छात्रों के भविष्य और उनके परिवारों पर पड़ने वाले प्रभाव को भी ध्यान में रखना जरूरी है। इससे पहले 1 सितंबर को कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के बीच दर्ज FIR रद्द करने का आदेश दिया था, हालांकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को इस राहत से बाहर रखा गया था।
युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखकर लिया गया फैसला
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने शुक्रवार को इस मामले की सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। याचिकाकर्ता एल. रामनाथन ने अदालत से मांग की थी कि प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ दर्ज FIR की जांच कराई जाए। उनका तर्क था कि पुलिस की स्वतंत्र कार्यप्रणाली में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए FIR रद्द करने का आदेश दिया था। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन में शामिल छात्र युवा हैं और अदालत को उनके माता-पिता तथा भविष्य पर पड़ने वाले प्रभाव को भी देखना चाहिए।
CJI ने टिप्पणी की कि अदालत नहीं चाहती कि युवा छात्र कानूनी मामलों में उलझे रहें और उन्हें बार-बार कोर्ट के चक्कर लगाने पड़ें। अदालत की यह टिप्पणी इस बात पर केंद्रित थी कि कानूनी कार्रवाई का असर छात्रों के भविष्य पर किस तरह पड़ सकता है।
क्या था 20 जुलाई का प्रदर्शन?
20 जुलाई को CJP के आह्वान पर करीब 30 हजार लोग सड़कों पर उतरे थे। प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांगों में शिक्षा व्यवस्था में सुधार और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा शामिल था। प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च करने की कोशिश कर रहे थे।
इस दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस ने बल प्रयोग किया, जिसके बाद पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़पें हुईं। घटना के बाद कई प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR दर्ज की गईं। बाद में इन मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी।
1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने 20 से 25 जुलाई के बीच प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज FIR रद्द करने का आदेश दिया था। हालांकि, जिन लोगों की आपराधिक पृष्ठभूमि थी, उन्हें इस राहत से अलग रखा गया था। अब इसी आदेश पर दोबारा विचार करने और FIR की जांच कराने की मांग वाली याचिका अदालत के सामने आई थी।
याचिकाकर्ता ने पुलिस की स्वतंत्रता का दिया तर्क
याचिकाकर्ता एल. रामनाथन ने दलील दी कि पुलिस स्वतंत्र और संप्रभु तरीके से अपना काम करती है, इसलिए उसकी कार्यवाही में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि कानून के पालन को लेकर एक स्पष्ट संदेश जाना जरूरी है। सुनवाई के दौरान उन्होंने अदालत में याचिका दायर करने के तरीके पर भी टिप्पणी की।
इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया आदेश का उल्लेख किया, जिसमें हिमाचल प्रदेश के 63 सांसदों और विधायकों से जुड़े आपराधिक मामलों में अभियोजन वापस लेने की अनुमति राज्य सरकार को दी गई थी। ये मामले कोविड-19 के दौरान सार्वजनिक प्रदर्शनों और धरनों से संबंधित थे।
अदालत ने याचिकाकर्ता से कहा कि उनकी याचिका मूल रूप से पहले दिए गए आदेश की समीक्षा की मांग कर रही है। पीठ ने अंततः याचिका खारिज कर दी।
संविधान के अनुच्छेद 142 की क्या है भूमिका?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को उसके समक्ष लंबित मामलों में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश और निर्देश जारी करने की शक्ति देता है। इसी प्रावधान का हवाला देते हुए अदालत ने पहले प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज कुछ FIR रद्द करने का आदेश दिया था।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने युवा छात्रों के भविष्य, उनके परिवारों और लंबी कानूनी प्रक्रिया के संभावित प्रभाव को अपने फैसले के पीछे महत्वपूर्ण कारण बताया। शुक्रवार को समीक्षा की मांग खारिज होने के बाद अदालत ने अपने पहले के आदेश में बदलाव करने से इनकार कर दिया।

