नई दिल्ली: वैश्विक चावल बाजार में बदलते Supply-Demand समीकरण के बीच भारत की Rice Export Market में हिस्सेदारी बढ़ने की संभावना बन रही है। दुनिया के कई प्रमुख चावल निर्यातक देशों में उत्पादन और Supply को लेकर दबाव बढ़ रहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय मांग मजबूत बनी हुई है। ऐसे में भारत के पास विदेशी बाजारों में अपनी मौजूदगी और मजबूत करने का अवसर हो सकता है।
हालांकि भारत के चावल उत्पादन के अनुमान में कमी की गई है, लेकिन देश में पर्याप्त Rice Stock मौजूद होने का दावा किया जा रहा है। Indian Rice Exporters Federation के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष देव गर्ग के अनुसार, उत्पादन अनुमान घटने के बावजूद भारत के पास घरेलू जरूरतों के साथ-साथ Export Demand पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक है।
गर्ग के मुताबिक, भारत ने पिछले साल करीब 151 million metric tonnes चावल का उत्पादन किया था और लगभग 22 million metric tonnes का निर्यात किया। इससे भारत दुनिया के प्रमुख Rice Exporters में अपनी मजबूत स्थिति बनाए हुए है।
उत्पादन अनुमान घटा, फिर भी पर्याप्त स्टॉक
भारत के चावल उत्पादन का अनुमान पहले करीब 156 million metric tonnes था, जिसे घटाकर अब लगभग 146-147 million metric tonnes कर दिया गया है। देव गर्ग ने इस कमी के पीछे El Nino समेत मौसम से जुड़ी चुनौतियों को जिम्मेदार बताया है।
इसके बावजूद उनका अनुमान है कि वर्ष के अंत तक भारत के पास 40 million metric tonnes से अधिक का surplus rice stock रह सकता है। यह मात्रा भारत के सालाना Export Volume की तुलना में काफी बड़ी होगी और इससे भारतीय exporters को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त गुंजाइश मिल सकती है।
गर्ग के अनुसार भारत के पास buffer requirements से करीब 270 lakh metric tonnes अधिक चावल का स्टॉक है। ऐसे में उत्पादन अनुमान में कमी के बावजूद देश के पास घरेलू खपत और विदेशी बाजार दोनों के लिए पर्याप्त cushion मौजूद रहने की संभावना है।
वियतनाम, थाईलैंड और पाकिस्तान पर सप्लाई का दबाव
भारत के लिए यह अवसर ऐसे समय आया है जब कई प्रतिस्पर्धी देशों में Rice Supply को लेकर दबाव बढ़ रहा है। गर्ग के मुताबिक, Vietnam ने भारत से चावल आयात करना शुरू कर दिया है, जबकि Thailand और Pakistan में भी घरेलू Supply Chain से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।
अगर प्रमुख निर्यातक देशों की Supply लंबे समय तक प्रभावित रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय खरीदार वैकल्पिक स्रोतों की तलाश कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में भारतीय Rice Exporters को नए बाजार हासिल करने और मौजूदा बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का फायदा मिल सकता है।
गर्ग के अनुमान के अनुसार, वैश्विक Rice Production में करीब 9 फीसदी की गिरावट आ सकती है, जबकि Demand में लगभग 14 फीसदी की बढ़ोतरी होने का अनुमान है। Production और Consumption के बीच बढ़ता यह अंतर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों और Supply पर दबाव बढ़ा सकता है।
Shipping Cost बढ़ने से महंगा हो रहा Export
भारत के लिए बढ़ती विदेशी मांग के साथ एक बड़ी चुनौती Shipping Cost भी है। समुद्री परिवहन में इस्तेमाल होने वाले Marine Fuel की कीमत में काफी बढ़ोतरी हुई है। गर्ग के अनुसार, Marine Fuel की कीमत पहले करीब 400-500 डॉलर थी, जो बढ़कर लगभग 1,300-1,400 डॉलर तक पहुंच गई है।
Fuel Cost बढ़ने का सीधा असर समुद्र के रास्ते होने वाले Rice Transportation पर पड़ता है। इससे विदेशी बाजारों में भारतीय चावल की Landed Cost बढ़ सकती है। खासकर वे देश जो बड़ी मात्रा में Rice Import करते हैं, उनके लिए बढ़ी Freight Cost खाद्य आयात को महंगा कर सकती है।
पिछले चार महीनों में Global Wholesale Rice Prices में करीब 15 फीसदी की बढ़ोतरी का भी दावा किया गया है। कम उत्पादन, महंगे Inputs और बढ़ती Transportation Cost के बीच अंतरराष्ट्रीय चावल कीमतों पर आगे भी दबाव बने रहने की संभावना जताई जा रही है।
भारत के सामने Export और Domestic Supply के बीच संतुलन की चुनौती
भारत के लिए बढ़ती Export Opportunity किसानों और exporters के लिहाज से सकारात्मक हो सकती है, लेकिन सरकार के सामने Domestic Food Security को बनाए रखने की चुनौती भी रहेगी। अगर विदेशों में चावल की मांग और कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तो Export बढ़ाने के साथ देश में पर्याप्त Buffer Stock और उचित घरेलू कीमत सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
Indian Rice Exporters Federation के मुताबिक, 60 से अधिक देश भारतीय चावल की Supply पर निर्भर हैं। इससे Global Food Security में भारत की भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है, खासकर उस समय जब अन्य प्रमुख suppliers उत्पादन या Supply Chain की समस्याओं से जूझ रहे हैं।
फिलहाल भारत का बड़ा Rice Stock exporters को अंतरराष्ट्रीय मांग का फायदा उठाने की गुंजाइश देता है। हालांकि यह बढ़त कितनी लंबे समय तक कायम रहती है, यह आने वाली फसल, मौसम की स्थिति, Production Levels, Logistics Cost और सरकार की Export Policy पर निर्भर करेगा। भारत को Export Growth बढ़ाने के साथ Domestic Requirements और Food Prices के बीच संतुलन साधना होगा।

