नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसले में कहा कि यदि कोई महिला कर्मचारी तीसरे बच्चे को जन्म देती है, तो उसे भी Maternity Leave (मातृत्व अवकाश) का हक है। कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एक सरकारी शिक्षिका को तीसरे बच्चे के लिए अवकाश देने से इंकार किया गया था। इस फैसले से भारत में कामकाजी महिलाओं के अधिकार और भारत में मातृत्व अवकाश नीति को लेकर एक नई दिशा मिली है।
Supreme Court ने क्यों पलटा हाई कोर्ट का फैसला?
मद्रास हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की Two Child Policy का हवाला देते हुए शिक्षिका को छुट्टी देने से मना कर दिया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट की constitutional bench ने इसे गलत बताया। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व अवकाश केवल सरकारी नीति नहीं, बल्कि एक महिला कर्मचारी का संवैधानिक अधिकार (Constitutional Right) है। इसके साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि मामला महिला की दूसरी शादी और तीसरे बच्चे से जुड़ा है, जो उसकी व्यक्तिगत प्रजनन ऑप्शन है, जिसमें राज्य हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
Maternity Leave का उद्देश्य सिर्फ आराम नहीं
जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की बेंच ने अपने फैसले में कहा:
Maternity Leave महिला की emotional well-being और health recovery के लिए जरूरी है।
यह छुट्टी महिला को न सिर्फ शारीरिक रूप से पुनः सक्षम करती है, बल्कि वह अपने नवजात की early care and development में भी सक्षम हो पाती है। इससे उसकी कार्यस्थल दक्षता भी बनी रहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा महिलाओं की dignity पर?
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर महिला को यह अधिकार है कि वह कितने बच्चे पैदा करना चाहती है। इसमें राज्य सरकार की कोई बाध्यता नहीं होनी चाहिए। प्रजनन अधिकार को नकारना, महिला की गरिमा, गोपनीयता और शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन है।
क्या बदलेगा इस फैसले से?
सरकारी नौकरी में कार्यरत महिलाओं को तीसरे बच्चे के लिए भी भुगतानशुदा मातृत्व अवकाश मिल सकती है। Two Child Policy अब मातृत्व अवकाश पर बाध्यता नहीं मानी जाएगी। यह फैसला अन्य राज्यों की महिला कर्मचारियों के लिए मानव संसाधन नीतियां को भी प्रभावित कर सकता है। इससे भारत में लैंगिक न्याय को मजबूती मिलेगी।
