नई दिल्ली. भारत में कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। खेती से जुड़े कुल कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी 76 प्रतिशत बताई गई है, लेकिन जमीन के मालिकाना हक में उनकी भागीदारी केवल 16 प्रतिशत है। ये आंकड़े कृषि क्षेत्र में महिलाओं के योगदान और उनके संपत्ति अधिकारों के बीच मौजूद बड़े अंतर को उजागर करते हैं। खेती में मेहनत और जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा संभालने के बावजूद, बड़ी संख्या में महिलाएं भूमि के स्वामित्व से वंचित हैं।
खेती में महिलाओं की अहम भूमिका
महिलाएं बुआई, निराई-गुड़ाई, कटाई, फसल की देखभाल और कृषि से जुड़े कई अन्य कामों में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी भूमिका केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि पशुपालन और कृषि आधारित गतिविधियों में भी वे सक्रिय रहती हैं।
इसके बावजूद जमीन के कानूनी मालिकाना हक में उनकी हिस्सेदारी काफी कम बताई गई है। जमीन के दस्तावेजों में नाम नहीं होने के कारण कई महिलाओं को किसान के रूप में औपचारिक पहचान, कृषि ऋण और सरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।
जमीन के मालिकाना हक से क्यों जुड़ा है आर्थिक सशक्तीकरण?
जमीन का स्वामित्व महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और निर्णय लेने की क्षमता से सीधे जुड़ा है। भूमि पर कानूनी अधिकार होने से महिलाओं के लिए बैंक ऋण, कृषि निवेश और सरकारी सहायता तक पहुंच आसान हो सकती है। इसके अलावा, संपत्ति में अधिकार होने से परिवार और खेती से जुड़े फैसलों में उनकी भागीदारी भी मजबूत हो सकती है।
इसके विपरीत, जब खेती में योगदान देने के बावजूद जमीन महिला के नाम पर नहीं होती, तो उसकी आर्थिक स्वतंत्रता और कृषि योजनाओं तक पहुंच प्रभावित हो सकती है।
कृषि क्षेत्र में महिलाओं के अधिकारों पर ध्यान देने की जरूरत
ये आंकड़े इस बात की ओर ध्यान दिलाते हैं कि कृषि क्षेत्र में महिलाओं के योगदान को मान्यता देने के साथ-साथ उनके भूमि अधिकारों को मजबूत करना भी जरूरी है। जमीन के दस्तावेजों में महिलाओं का नाम दर्ज कराने, संपत्ति अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और कृषि योजनाओं तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करने जैसे कदम इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
खेती में महिलाओं की बड़ी भागीदारी के बावजूद जमीन के स्वामित्व में उनकी कम हिस्सेदारी कृषि क्षेत्र में लैंगिक असमानता की गंभीर तस्वीर पेश करती है। महिलाओं को वास्तविक रूप से सशक्त बनाने के लिए उनके श्रम के साथ-साथ संपत्ति और संसाधनों पर अधिकार सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
