नई दिल्ली. भारत इंडिपेंडेंट इथेनॉल प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (BIEPA) ने इथेनॉल सप्लाई ईयर (ESY) 2026-27 के टेंडर में आवंटन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। एसोसिएशन ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) से मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करने की मांग की है। उसका आरोप है कि लॉन्ग-टर्म ऑफटेक एग्रीमेंट (LTOA) रखने वाले उत्पादकों को अतिरिक्त प्राथमिकता मिलने से स्वतंत्र इथेनॉल निर्माताओं के लिए अवसर सीमित हो सकते हैं।
इस टेंडर के तहत करीब 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की आपूर्ति की जानी है। BIEPA का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में LTOA धारकों को दो स्तरों पर प्राथमिकता मिलती है। इससे अन्य पात्र उत्पादकों को कम मात्रा में आपूर्ति का मौका मिल सकता है, भले ही वे कम कीमत पर इथेनॉल देने में सक्षम हों।
LTOA धारकों को दो स्तरों पर प्राथमिकता देने पर सवाल
एसोसिएशन के अनुसार, मौजूदा व्यवस्था में पहले LTOA धारकों को उनके अनुबंधित मात्रा के लिए प्राथमिकता दी जाती है। इसके बाद उन्हें स्वीकार की गई एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EOI) में दर्ज डिजाइन क्षमता तक अतिरिक्त प्राथमिकता भी मिल सकती है। यह अतिरिक्त आवंटन बेस्ट-एफर्ट के आधार पर किया जाता है।
BIEPA का तर्क है कि इस व्यवस्था के चलते गैर-LTOA उत्पादकों को बची हुई मात्रा ही मिल सकती है। एसोसिएशन ने सवाल उठाया है कि जब अन्य पात्र निर्माता गुणवत्ता, नियामकीय शर्तों और आपूर्ति की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं, तो उन्हें केवल अनुबंध की स्थिति के आधार पर पीछे क्यों रखा जाए।
कम कीमत वाले इथेनॉल की खरीद को प्राथमिकता देने की मांग
BIEPA ने इथेनॉल की अलग-अलग श्रेणियों की कीमतों का हवाला देते हुए खरीद प्रक्रिया में लागत को महत्व देने की मांग की है। एसोसिएशन के अनुसार, मक्के से बने इथेनॉल की कीमत 68.86 रुपये प्रति लीटर है। इसमें 66.07 रुपये का मूल मूल्य और 2.79 रुपये का प्रोत्साहन शामिल है।
वहीं, खराब खाद्यान्न (DFG) से बने इथेनॉल की कीमत 64 रुपये प्रति लीटर और भारतीय खाद्य निगम (FCI) के पास मौजूद अतिरिक्त चावल से बने इथेनॉल की कीमत 60.32 रुपये प्रति लीटर बताई गई है।
एसोसिएशन ने LTOA के क्लॉज 6.2 पर भी सवाल उठाए हैं। इसके तहत अनुबंध धारकों को तय मात्रा की आपूर्ति में कीमत की परवाह किए बिना प्राथमिकता मिलने की बात कही गई है।
BIEPA का कहना है कि दीर्घकालिक समझौतों का उद्देश्य आपूर्ति की मात्रा सुनिश्चित करना था, लेकिन यदि समान रूप से पात्र निर्माता कम कीमत पर इथेनॉल उपलब्ध करा सकते हैं, तो खरीद प्रक्रिया में उनकी पेशकश पर भी उचित विचार होना चाहिए।
एसोसिएशन के अध्यक्ष पुष्पिंदर सिंह ममिक ने कहा कि LTOA का मकसद बेस्ट-एफर्ट के आधार पर मात्रा की उपलब्धता सुनिश्चित करना था। उनके मुताबिक, जब नियमों के अनुरूप कम कीमत वाला इथेनॉल उपलब्ध हो, तो खरीद में उसे भी उचित महत्व मिलना चाहिए।
अतिरिक्त प्राथमिकता के प्रावधान पर स्पष्टीकरण मांगा
BIEPA ने Annexure III के क्लॉज B(2)(II)(i)(a) के तहत LTOA धारकों को मिलने वाली अतिरिक्त प्राथमिकता पर भी स्पष्टीकरण मांगा है। यह प्रावधान उन्हें स्वीकार की गई EOI डिजाइन क्षमता तक प्राथमिकता देने से संबंधित है।
एसोसिएशन का तर्क है कि क्लॉज 6.2 पहले ही अनुबंधित मात्रा की सुरक्षा करता है। ऐसे में निर्धारित अनुबंध से आगे अतिरिक्त प्राथमिकता देने की जरूरत और उसके आधार को स्पष्ट किया जाना चाहिए।
BIEPA ने द्विपक्षीय LTOA के क्लॉज 6.8 को सार्वजनिक खरीद प्रक्रिया में लागू किए जाने पर भी सवाल उठाया है। एसोसिएशन के अनुसार, यह क्लॉज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध EOI या टेंडर दस्तावेजों में शामिल नहीं था।
ममिक ने कहा कि एसोसिएशन यह समझना चाहती है कि जब अन्य पात्र उत्पादक समान गुणवत्ता, नियामकीय और आपूर्ति संबंधी शर्तों को पूरा करते हैं, तो अनुबंधित मात्रा से आगे अतिरिक्त प्राथमिकता क्यों दी जानी चाहिए। उन्होंने आवंटन के मानदंडों और अनुबंध संबंधी प्रावधानों में अधिक पारदर्शिता की मांग की।
स्वतंत्र इथेनॉल उत्पादकों के निवेश पर पड़ सकता है असर
BIEPA ने चेतावनी दी है कि मौजूदा आवंटन व्यवस्था स्वतंत्र इथेनॉल निर्माताओं की वित्तीय स्थिति को प्रभावित कर सकती है। एसोसिएशन के मुताबिक, कई उत्पादकों ने सरकार की इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) योजना के तहत मांग को देखते हुए विशेष उत्पादन संयंत्र स्थापित किए थे।
इनमें से कई संयंत्रों को खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग की ब्याज अनुदान योजनाओं के साथ-साथ बैंकों से मिले बड़े कर्ज के माध्यम से वित्तीय सहायता मिली थी।
एसोसिएशन ने बताया कि इन संयंत्रों को मिले पर्यावरणीय अनुमोदन के तहत उनका संचालन इथेनॉल उत्पादन और ब्लेंडिंग के उद्देश्य तक सीमित है। ऐसे में यदि सरकारी खरीद में पर्याप्त मात्रा का आवंटन नहीं मिलता, तो उत्पादकों के पास अपने उत्पादन को दूसरे बाजारों में भेजने के सीमित विकल्प रह सकते हैं।
किसानों और ग्रामीण रोजगार पर भी असर की आशंका
BIEPA का कहना है कि पर्याप्त ऑर्डर नहीं मिलने पर स्वतंत्र इथेनॉल संयंत्रों का उपयोग उनकी पूरी क्षमता के अनुसार नहीं हो पाएगा। इससे बैंक ऋण चुकाने में कठिनाई आ सकती है और इन इकाइयों को अनाज की आपूर्ति करने वाले किसानों पर भी असर पड़ सकता है। संयंत्रों से जुड़े ग्रामीण रोजगार पर भी दबाव पड़ने की आशंका जताई गई है।
एसोसिएशन के अध्यक्ष ममिक के अनुसार, स्वतंत्र उत्पादकों ने सरकारी नीति के अनुरूप उत्पादन क्षमता विकसित करने में निवेश किया है। यदि उन्हें केवल बची हुई मात्रा की आपूर्ति का अवसर मिलता है, तो उनके निवेश और उससे जुड़े बैंक ऋण जोखिम में पड़ सकते हैं।
BIEPA ने सरकार और तेल विपणन कंपनियों से ऐसी व्यवस्था बनाने की मांग की है, जिसमें सभी पात्र उत्पादकों को निष्पक्ष अवसर मिले और सार्वजनिक खरीद में लागत तथा आपूर्ति की शर्तों पर उचित विचार किया जाए।
