नई दिल्ली. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) की संयुक्त रिपोर्ट ने दुनिया में बढ़ते Cancer Burden को लेकर गंभीर चेतावनी दी है। 8 जुलाई 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया की लगभग 92 प्रतिशत आबादी अपने जीवनकाल में या तो स्वयं कैंसर का सामना करेगी या फिर परिवार के किसी करीबी सदस्य के कैंसर से प्रभावित होगी। रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर अब केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक संकट का भी रूप ले चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में कैंसर के मामलों में तेज बढ़ोतरी होगी और इसका सबसे अधिक असर उन देशों पर पड़ेगा जहां Cancer Diagnosis, Cancer Treatment और Healthcare Infrastructure अभी भी कमजोर हैं।
2024 में सामने आए 2 करोड़ से ज्यादा नए कैंसर मामले
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में दुनिया भर में 2.06 करोड़ नए कैंसर मामलों की पहचान हुई, जबकि 97 लाख लोगों की मौत इस बीमारी के कारण हुई। पुरुषों में Lung Cancer सबसे अधिक पाया गया, जिसके करीब 16 लाख नए मामले सामने आए। इसके बाद Prostate Cancer के लगभग 15 लाख मरीज दर्ज किए गए। महिलाओं में Breast Cancer सबसे आम कैंसर बना रहा, जिसके 24 लाख नए मामले सामने आए। वहीं महिलाओं में फेफड़ों का कैंसर दूसरे स्थान पर रहा। Colorectal Cancer पुरुषों और महिलाओं दोनों में तीसरा सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर रहा।
हर साल चार लाख बच्चे भी हो रहे कैंसर का शिकार
WHO-IARC रिपोर्ट में बताया गया है कि हर वर्ष लगभग चार लाख बच्चे और किशोर (0 से 19 वर्ष) कैंसर से प्रभावित होते हैं। इनमें अधिकांश मामले Low and Middle Income Countries में सामने आते हैं, जहां समय पर जांच और इलाज की सुविधाएं सीमित हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में कैंसर की समय पर पहचान और उपचार की कमी के कारण मृत्यु दर अधिक बनी हुई है।
समय से पहले मौतों का बड़ा कारण बन रहा है कैंसर
रिपोर्ट के अनुसार 2024 में कैंसर से हुई कुल 97 लाख मौतों में से 48 लाख से अधिक मौतें 30 से 69 वर्ष की आयु वर्ग में हुईं। यह दर्शाता है कि कैंसर अब समय से पहले होने वाली मौतों का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। अनुमान है कि हर नौ पुरुषों में से एक और हर 13 महिलाओं में से एक व्यक्ति 75 वर्ष की आयु से पहले कैंसर के कारण अपनी जान गंवा सकता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि Sustainable Development Goals (SDGs) के तहत समय से पहले होने वाली गैर-संचारी रोगों से मौतों को कम करने का लक्ष्य अधिकांश देशों में पीछे छूटता जा रहा है।
कैंसर से लाखों बच्चों के सिर से उठा माता-पिता का साया
रिपोर्ट में कैंसर के सामाजिक प्रभावों पर भी प्रकाश डाला गया है। वर्ष 2020 में कैंसर से हुई मौतों के कारण दुनिया भर में 24.5 लाख बच्चे अनाथ हो गए। इनमें 10.4 लाख बच्चों ने अपनी मां और 14.1 लाख बच्चों ने अपने पिता को खो दिया। माताओं की मौत के मामलों में Breast Cancer और Cervical Cancer सबसे बड़ी वजह रहे। एशिया और अफ्रीका में इस समस्या का सबसे अधिक असर देखने को मिला। भारत, चीन, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, इथियोपिया और पाकिस्तान मिलकर दुनिया में मातृ-अनाथ बच्चों के लगभग 40 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार रहे।
मानसिक और आर्थिक संकट भी बढ़ा रहा है कैंसर
रिपोर्ट के मुताबिक कैंसर का असर केवल शरीर तक सीमित नहीं रहता। WHO Global Survey के अनुसार आधे से अधिक मरीजों और उनके परिवारों ने मानसिक तनाव, अवसाद और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याओं का सामना किया। करीब 45 प्रतिशत लोगों को गंभीर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। महंगे इलाज, दवाओं, अस्पताल तक यात्रा, आय में कमी और देखभाल से जुड़े खर्चों के कारण कई परिवार आर्थिक संकट में पहुंच गए। रिपोर्ट में कैंसर को Medical Bankruptcy यानी इलाज के कारण आर्थिक रूप से बर्बाद होने का प्रमुख कारण भी बताया गया है।
2050 तक 3.5 करोड़ नए मरीजों का अनुमान
WHO-IARC का अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया में हर साल कैंसर के नए मामलों की संख्या बढ़कर 3.5 करोड़ तक पहुंच जाएगी, जो वर्तमान की तुलना में लगभग 66.7 प्रतिशत अधिक होगी। इसके पीछे बढ़ती आबादी, बुजुर्गों की संख्या में इजाफा और बदलती जीवनशैली को प्रमुख कारण माना गया है। हालांकि यह बढ़ोतरी सभी देशों में समान नहीं होगी।
गरीब देशों में सबसे ज्यादा बढ़ेगा कैंसर का बोझ
रिपोर्ट के अनुसार High Income Countries में कैंसर की पहचान अपेक्षाकृत जल्दी हो जाती है और मरीजों को बेहतर इलाज मिलता है, जिससे वहां जीवित रहने की संभावना अधिक रहती है। इसके विपरीत Low Income Countries में जांच, पैथोलॉजी, इमेजिंग, सर्जरी, रेडियोथेरेपी और आवश्यक दवाओं की कमी के कारण इलाज योग्य कैंसर से भी बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक निम्न आय वाले देशों में कैंसर के नए मामलों में 133 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।
इलाज और जांच तक असमान पहुंच बढ़ा रही है खतरा
WHO-IARC ने पहली बार विभिन्न देशों में Five-Year Survival Rate का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट के अनुसार विकसित देशों में Breast Cancer से पीड़ित 85 प्रतिशत से अधिक महिलाएं पांच वर्ष या उससे अधिक समय तक जीवित रहती हैं, जबकि निम्न आय वाले देशों में यह आंकड़ा 45 प्रतिशत से भी कम है। बच्चों में Lymphoid Leukaemia के मामलों में यूरोप में पांच वर्षीय जीवित रहने की दर करीब 93 प्रतिशत है, जबकि अफ्रीका के कुछ हिस्सों में यह केवल 19 प्रतिशत है।
रिपोर्ट के अनुसार दुनिया की लगभग 47 प्रतिशत आबादी के पास आज भी बुनियादी Cancer Diagnostic Services जैसे पैथोलॉजी और इमेजिंग की पर्याप्त सुविधा नहीं है। उप-सहारा अफ्रीका में प्रति दस लाख आबादी पर केवल एक पैथोलॉजिस्ट उपलब्ध है, जो विकसित देशों की तुलना में लगभग 50 गुना कम है। इसी तरह फेफड़ों के कैंसर की सर्जरी 96 प्रतिशत उच्च आय वाले देशों की सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल है, जबकि निम्न आय वाले देशों में यह सुविधा केवल 19 प्रतिशत तक सीमित है।
समान स्वास्थ्य सुविधाएं ही बनेंगी सबसे बड़ा समाधान
WHO और IARC ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि आने वाले वर्षों में कैंसर से लड़ाई केवल नई दवाओं या आधुनिक तकनीक से नहीं जीती जा सकेगी। इसके लिए सभी देशों में Cancer Prevention, Early Detection, Early Diagnosis और Affordable Cancer Treatment तक समान पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी होगा। यदि स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद असमानताओं को दूर नहीं किया गया तो भविष्य में किसी व्यक्ति के जीवित रहने की संभावना इस बात पर अधिक निर्भर करेगी कि वह किस देश में रहता है, न कि केवल उसके कैंसर के प्रकार पर।

