नई दिल्ली. भारत अपने स्वदेशी सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम को मजबूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) 30 अक्टूबर 2026 को NVS-03 सैटेलाइट लॉन्च करने की तैयारी में है। इस मिशन से भारत के Navigation with Indian Constellation यानी NavIC सिस्टम को दोबारा मजबूत करने की उम्मीद है। जनवरी 2025 में NVS-02 के मिशन में आई तकनीकी समस्या और पहले के कुछ नेविगेशन उपग्रहों की एटॉमिक क्लॉक में खराबी के कारण भारत की स्वतंत्र लोकेशन सेवाएं प्रभावित हुई हैं। ऐसे में NVS-03 की सफलता बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
30 अक्टूबर को लॉन्च होगा NVS-03 सैटेलाइट
रिपोर्टों के मुताबिक, ISRO का NVS-03 मिशन 30 अक्टूबर को रात 11 बजकर 51 मिनट पर लॉन्च किया जाना निर्धारित है। इसे आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से GSLV-F18 रॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजने की योजना है। NVS-03 भारत के दूसरी पीढ़ी के NavIC उपग्रहों की श्रृंखला का तीसरा सैटेलाइट है।
इस श्रृंखला का उद्देश्य भारत की क्षेत्रीय नेविगेशन व्यवस्था को अधिक भरोसेमंद बनाना और मौजूदा उपग्रहों की जगह नए उपग्रहों को शामिल करके सेवाओं की निरंतरता बनाए रखना है। हालांकि, केवल सफल लॉन्च से नेविगेशन सेवाएं तुरंत बहाल नहीं होंगी। सैटेलाइट को अपनी निर्धारित कक्षा में पहुंचने, तकनीकी जांच पूरी करने और परिचालन के लिए तैयार होने की प्रक्रिया से गुजरना होगा।
क्या है NavIC और भारत के लिए क्यों जरूरी है?
NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। यह भारत का अपना क्षेत्रीय सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम है, जिसे अमेरिकी GPS जैसे विदेशी सिस्टम पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से विकसित किया गया था।
NavIC भारत और इसकी सीमाओं से लगभग 1,500 किलोमीटर आगे तक के क्षेत्र में पोजिशनिंग, नेविगेशन और सटीक समय संबंधी सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका इस्तेमाल परिवहन, समुद्री नेविगेशन, आपदा प्रबंधन और सामरिक गतिविधियों में किया जा सकता है। इसके जरिए नागरिकों के साथ-साथ अधिकृत रणनीतिक उपयोगकर्ताओं को भी सेवाएं देने की व्यवस्था है।
NavIC में नागरिक उपयोग के लिए Standard Positioning Service (SPS) और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए Restricted Service (RS) उपलब्ध कराने की योजना है। इस सिस्टम का मजबूत होना भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
NVS-02 मिशन में क्या गड़बड़ी हुई थी?
भारत के नेविगेशन सिस्टम को बड़ा झटका जनवरी 2025 में लगा, जब ISRO ने NVS-02 सैटेलाइट लॉन्च किया। 29 जनवरी 2025 को GSLV-F15 रॉकेट ने सैटेलाइट को उसकी शुरुआती ट्रांसफर ऑर्बिट में सफलतापूर्वक पहुंचा दिया था। लेकिन इसके बाद सैटेलाइट को उसकी निर्धारित परिचालन कक्षा में पहुंचाने के लिए जरूरी ऑर्बिट-रेजिंग प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।
ISRO की जांच के मुताबिक, इंजन के ऑक्सिडाइजर लाइन से जुड़े एक पाइरो वाल्व तक जरूरी ड्राइव सिग्नल नहीं पहुंचा। इसके कारण सैटेलाइट के इंजन को सक्रिय करके उसकी कक्षा बढ़ाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई।
यानी समस्या रॉकेट के सैटेलाइट को अंतरिक्ष में पहुंचाने में नहीं, बल्कि उसके बाद सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा में स्थापित करने की प्रक्रिया में आई थी। इस तकनीकी गड़बड़ी के कारण NVS-02 अपेक्षित परिचालन सेवाएं शुरू नहीं कर सका। ISRO ने जांच के बाद भविष्य के मिशनों में ऐसी समस्या की आशंका कम करने के लिए सुधारात्मक उपायों की सिफारिश की थी।
एटॉमिक क्लॉक की खराबी ने भी बढ़ाई चुनौती
सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम में केवल उपग्रहों का अंतरिक्ष में मौजूद होना पर्याप्त नहीं है। इन उपग्रहों में लगी एटॉमिक क्लॉक भी बेहद अहम होती हैं। ये अत्यंत सटीक समय संकेत उपलब्ध कराती हैं, जिनकी मदद से रिसीवर सैटेलाइट से मिलने वाले सिग्नल के आधार पर अपनी स्थिति का पता लगाता है।
NavIC की पहली पीढ़ी के कुछ उपग्रहों में एटॉमिक क्लॉक से जुड़ी समस्याएं सामने आई थीं। इसके अलावा कुछ पुराने उपग्रह अपनी निर्धारित मिशन अवधि भी पूरी कर चुके हैं। NVS-02 के निर्धारित कक्षा में नहीं पहुंच पाने से सिस्टम पर दबाव और बढ़ गया।
सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, जुलाई 2026 तक NavIC के तीन उपग्रह पोजिशनिंग, नेविगेशन और टाइमिंग सेवाओं के लिए उपलब्ध थे। स्वतंत्र पोजिशनिंग सेवाओं के लिए कम से कम चार परिचालन उपग्रहों की जरूरत होती है। इसी वजह से सिस्टम की स्वतंत्र लोकेशन सेवा प्रभावित हुई है, हालांकि टाइमिंग सेवा काम कर रही है।
NVS-03 से भारत को क्या फायदा हो सकता है?
NVS-03 की सफलता से NavIC के उपग्रह नेटवर्क को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। यदि यह सैटेलाइट निर्धारित कक्षा में पहुंचकर सफलतापूर्वक परिचालन शुरू करता है, तो सिस्टम में उपलब्ध उपग्रहों की संख्या बढ़ेगी और स्वतंत्र पोजिशनिंग सेवाओं को बहाल करने की दिशा में प्रगति हो सकती है।
इससे परिवहन, समुद्री गतिविधियों, आपदा प्रबंधन और अन्य नागरिक सेवाओं में NavIC की उपयोगिता बढ़ सकती है। साथ ही, रक्षा और अन्य रणनीतिक कार्यों के लिए भारत के अपने नेविगेशन सिस्टम की उपलब्धता भी महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
हालांकि, सिस्टम की दीर्घकालिक विश्वसनीयता के लिए केवल एक नए उपग्रह का सफल होना पर्याप्त नहीं होगा। उपग्रहों की संख्या, उनकी तकनीकी स्थिति और बैकअप व्यवस्था भी जरूरी है। ISRO की योजना दूसरी पीढ़ी के कुल पांच NavIC उपग्रहों की श्रृंखला विकसित करने की है। NVS-03 के बाद NVS-04 और NVS-05 भी इस व्यवस्था को मजबूत करने के प्रयास का हिस्सा हैं।
क्या NVS-03 लॉन्च होते ही भारत का GPS सिस्टम पूरी तरह चालू हो जाएगा?
इसका जवाब है—नहीं, जरूरी नहीं। NVS-03 का सफल प्रक्षेपण पहला महत्वपूर्ण चरण होगा। इसके बाद सैटेलाइट को निर्धारित कक्षा में पहुंचना होगा और उसकी प्रणालियों की जांच के बाद उसे परिचालन में शामिल किया जाएगा।
NavIC को स्वतंत्र पोजिशनिंग सेवा देने के लिए कम से कम चार परिचालन उपग्रहों की जरूरत है। इसलिए NVS-03 की सफलता इस दिशा में अहम हो सकती है, लेकिन सेवाओं की बहाली सैटेलाइट के सही तरीके से स्थापित होने और पूरे सिस्टम की परिचालन स्थिति पर निर्भर करेगी।
फिलहाल, 30 अक्टूबर का मिशन भारत के स्वदेशी नेविगेशन नेटवर्क को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसकी सफलता से NavIC की क्षमताओं में सुधार की उम्मीद है, लेकिन भारत के इस GPS विकल्प की दीर्घकालिक मजबूती के लिए आने वाले उपग्रह मिशन और तकनीकी विश्वसनीयता भी उतनी ही अहम होंगे।
