नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने कहा है कि भारतीय नागरिक का मतदान करने का अधिकार संविधान के मूल ढांचे से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि ऐसी कोई भी प्रक्रिया, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में नागरिक अपने मताधिकार से वंचित हो जाएं, मनमानी मानी जाएगी और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 326 के विपरीत होगी। जस्टिस भुइयां ने यह टिप्पणी 19वीं NALSAR-जस्टिस बी.आर. साहनी मेमोरियल मूट कोर्ट प्रतियोगिता 2026 के समापन समारोह में अपने संबोधन के दौरान की।
मतदान का अधिकार नागरिकता का अहम हिस्सा
जस्टिस भुइयां ने कहा कि मतदान का अधिकार केवल वैधानिक अधिकार नहीं है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 326 से जुड़ा संवैधानिक अधिकार है। इस अनुच्छेद के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान नागरिकों को ऐसे दो वर्गों में नहीं बांटता, जिनमें कुछ लोगों के पास मतदान का अधिकार हो और कुछ के पास न हो।
उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों भारतीय नागरिक अपने वोट के अधिकार से वंचित हो जाते हैं और वे अपने ही देश में बिना मतदान अधिकार वाले नागरिक बन जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगी। जस्टिस भुइयां के मुताबिक, किसी भी तर्क के आधार पर ऐसी स्थिति को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
SIR विवाद के बीच टिप्पणी महत्वपूर्ण
जस्टिस भुइयां ने अपने संबोधन में चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया। हालांकि, उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब विभिन्न राज्यों में मतदाता सूचियों के SIR को लेकर विवाद और कानूनी बहस चल रही है। इस प्रक्रिया में पात्र मतदाताओं के नाम छूटने की आशंकाओं को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
जस्टिस भुइयां ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल विशेषताओं में शामिल हैं और मतदान का अधिकार इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि आम नागरिक के लिए देश के शासन में भागीदारी का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम उसका वोट है।
अनुच्छेद 326 में मनमाना बदलाव नहीं हो सकता
जस्टिस भुइयां ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में मतदान के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं माना गया है, लेकिन People’s Union for Civil Liberties v. Union of India मामले में इसे संवैधानिक अधिकार माना गया है। उन्होंने कहा कि कानून मतदान के अधिकार के इस्तेमाल को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन ऐसी व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 की सीमाओं के भीतर होनी चाहिए।
अनुच्छेद 326 के तहत 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का भारतीय नागरिक लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मतदान का हकदार है, हालांकि संविधान में निर्धारित कुछ अयोग्यताएं लागू होती हैं। जस्टिस भुइयां ने कहा कि इन संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन करने वाला कानून वैध नहीं रह सकता। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं के जरिए भी मतदान के अधिकार को बिना उचित आधार के अनुचित या अव्यावहारिक तरीके से सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
वोट का अधिकार समानता के सिद्धांत से जुड़ा
जस्टिस भुइयां ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार को भारत के स्वतंत्रता संघर्ष और संविधान की बुनियादी सोच से जुड़ा बताया। उनके अनुसार, अनुच्छेद 326 संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के सिद्धांत को व्यावहारिक अर्थ देता है। मतदान का अधिकार समाज के अलग-अलग आर्थिक और सामाजिक वर्गों के लोगों को देश के शासन में समान रूप से अपनी बात रखने का अवसर देता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि संविधान सर्वोच्च है और किसी भी प्राधिकरण या संस्था को संवैधानिक अधिकारों की मूल भावना के विपरीत काम करने का अधिकार नहीं है। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब SIR और मतदाता सूचियों में बदलाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई मामले विचाराधीन रहे हैं।
