नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की शक्तियों को लेकर एक अहम सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगा कि कानूनी पेशे को रेगुलेट करने वाली वैधानिक संस्था BCI के पास कानून कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के संचालन व नियमन का अधिकार है या नहीं। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी सवाल किया कि कानूनी शिक्षा को रेगुलेट करने के लिए BCI को विशेषज्ञ संस्था क्यों माना जाए, जबकि इस क्षेत्र में कानून के विद्वान और अकादमिक विशेषज्ञ मौजूद हैं।
BCI की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मौखिक टिप्पणी में कहा कि BCI सामान्य दिशा-निर्देश तय कर सकती है, जैसे कानून की पढ़ाई कितने साल की होनी चाहिए या पाठ्यक्रम से जुड़े व्यापक मानक क्या हों। हालांकि, कोर्ट ने सवाल किया कि क्या इन सामान्य दिशानिर्देशों से आगे बढ़कर BCI को कानून कॉलेजों या विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण रखने का अधिकार दिया जा सकता है।
पीठ ने इस मामले में यह मूल सवाल सामने रखा कि आखिर BCI कानून कॉलेजों को किस आधार पर रेगुलेट कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि यदि यह तय हो जाए कि BCI को लॉ स्कूल या विश्वविद्यालय को रेगुलेट करने का अधिकार है या नहीं, तो मामले से जुड़े कई दूसरे मुद्दे भी स्पष्ट हो जाएंगे।
कानून शिक्षा के विशेषज्ञों की भूमिका पर भी सवाल
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की कि कानूनी शिक्षा से जुड़े मामलों में अकादमिक विशेषज्ञों और कानून के विद्वानों की भूमिका महत्वपूर्ण होनी चाहिए। कोर्ट ने सवाल किया कि BCI को कानूनी शिक्षा के नियमन के लिए विशेषज्ञ संस्था क्यों माना जाए।
पीठ के अनुसार, BCI कानून की पढ़ाई से जुड़े कुछ सामान्य मानक तय कर सकती है, लेकिन किसी विश्वविद्यालय या कानून कॉलेज के संचालन पर नियंत्रण का सवाल अलग है। कोर्ट ने इसी अंतर की जांच करने की बात कही है।
BCI-PEARL FIRST Trust को लेकर क्या है विवाद?
यह मामला BCI-PEARL FIRST Trust और उसके जरिए स्थापित कानून संस्थानों से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने BCI के पुराने ट्रस्ट को खत्म करने और उसकी रकम नए ट्रस्ट में स्थानांतरित किए जाने से जुड़े घटनाक्रम का उल्लेख किया।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि इस पूरे मामले को लेकर CBI की जांच भी लंबित है। याचिकाकर्ताओं ने BCI-PEARL FIRST Trust के गठन और उसके बाद कानून संस्थानों की स्थापना को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
BCI पदाधिकारियों के ट्रस्टी बनने पर भी आपत्ति
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह आरोप भी रखा गया कि BCI के चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने खुद को ट्रस्ट का आजीवन ट्रस्टी घोषित किया था। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, इसी ट्रस्ट ने गोवा और आंध्र प्रदेश में कानून कॉलेज स्थापित किए।
मामले में दो राज्यों के कानूनों को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इन प्रावधानों के जरिए संबंधित संस्थानों में BCI का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो रहा है। सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि संबंधित कानूनों के तहत 35 सदस्यीय एग्जीक्यूटिव काउंसिल में से 27 सदस्यों को BCI नामित कर सकती है।
BCI ने ट्रस्टी व्यवस्था में बदलाव की जानकारी दी
BCI की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने कोर्ट को बताया कि पहले की सुनवाई में उठाए गए सवालों के बाद इस विषय पर विचार किया गया है। उन्होंने कहा कि BCI ने अब ऐसा प्रस्ताव पारित किया है जिसके तहत किसी व्यक्ति को आजीवन ट्रस्टी बनाए रखने का प्रावधान नहीं होगा।
उनके अनुसार, ट्रस्टियों का कार्यकाल BCI में उनकी सदस्यता की अवधि के साथ जुड़ा रहेगा। यानी BCI की सदस्यता खत्म होने के साथ ट्रस्टी के तौर पर उनका कार्यकाल भी समाप्त हो जाएगा।
याचिकाकर्ता ने उठाया हितों के टकराव का सवाल
प्रशांत भूषण ने दलील दी कि जो संस्था किसी क्षेत्र की नियामक है, उसे उसी क्षेत्र की संस्था चलाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने इसे हितों के टकराव का मुद्दा बताया। उनका तर्क था कि यदि BCI कानून कॉलेज चलाती है और साथ ही उन्हीं संस्थानों के लिए नियामक की भूमिका भी निभाती है, तो नियामक और संस्था संचालक की भूमिकाएं एक-दूसरे से टकरा सकती हैं।
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने देश के पहले लॉ स्कूल की स्थापना से जुड़ा उदाहरण भी सामने रखा। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि जिस संस्थान का संदर्भ दिया गया, वह एक सार्वजनिक विश्वविद्यालय था और उसकी एग्जीक्यूटिव काउंसिल पर BCI का वर्चस्व नहीं था।
फीस और ट्रस्ट में आने वाली रकम पर भी सवाल
मामले में प्रस्तावित फीस स्ट्रक्चर को लेकर भी सवाल उठाए गए। प्रशांत भूषण ने प्रस्तावित 25 हजार रुपये की फीस का उल्लेख किया। वहीं, एक अन्य जुड़े मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने कहा कि ट्रस्ट में करोड़ों रुपये की रकम आ रही है और पूरे मामले की जांच की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने याचिका पर नोटिस जारी करते हुए बार काउंसिल ऑफ इंडिया से जवाब मांगा है। अब मामले की आगे की सुनवाई में कोर्ट इस महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर विचार करेगा कि BCI की वैधानिक शक्तियां कानून की प्रैक्टिस को रेगुलेट करने तक सीमित हैं या उनमें कानून कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की शिक्षा एवं प्रशासन को नियंत्रित करने की शक्ति भी शामिल है।
