नई दिल्ली: केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने वाली याचिका पर मंगलवार को केंद्र सरकार से जवाब मांगा गया। जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र को नोटिस जारी किया है। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) के स्थायी और सेवानिवृत्त अधिकारियों सहित कुल 34 लोगों की मौत हो गई है।
सीआईएसएफ अधिकारियों ने अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया
कंपनियों में सीआईएसएफ के अधिकारी शामिल हैं। सीआईएसएफ संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची की प्रविष्टि 2 के अंतर्गत संघ की सशस्त्र सेना है। सीआईएसएफ के अलावा सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) को भी आम तौर पर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) कहा जाता है।
संगठन ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 के कई विरोधियों को चुनौती देते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के खिलाफ बताया है। याचिका में यह भी कहा गया है कि शक्तियों के पृथक्करण के कानूनी सिद्धांत का उल्लंघन है।
Supreme Court के पुराने फैसले का भी दिया गया हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के पहले के वकील की गवाही में कहा गया है कि अदालत ने हरानंद बनाम भारत संघ मामले में साल 2019 में सीआईएसएफ और अन्य सीएपीएफ को संगठित ग्रुप ए सेंट्रल सिविल सर्विस के रूप में मान्यता दी थी। कोर्ट ने इन सर्विसेज के अधिकारियों को नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (एनएफएफयू) का लाभ देने का भी निर्देश दिया था।
किसानों के अनुसार, 23 मई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य फैसले में यह स्पष्ट किया था कि सीआईएसएफ और अन्य सीएपीएफ को संगठन के लिए संगठित ग्रुप ए सेंट्रल सिविल सर्विस में शामिल किया जाना चाहिए। इसमें कैडर रिव्यू भी शामिल है।
याचिका में कहा गया है कि Organised Group A Central Civil Service का दर्जा मिलने से अधिकारियों की Promotion, Cadre Posts पर Appointment, Promotion के लिए Eligibility Criteria, Pay, NFFU और Cadre Review जैसे Service Conditions पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
याचिका में कहा- पुराने फैसले के प्रभाव को खत्म करने की कोशिश
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि नए CAPF Act के जरिए Parliament ने Supreme Court के पुराने फैसलों के प्रभाव को अप्रत्यक्ष रूप से खत्म करने की कोशिश की है। याचिका के अनुसार, Act की Section 3 में केंद्र सरकार को CAPF अधिकारियों की Promotion, Deputation और Service Conditions से जुड़े नियम बनाने की शक्ति दी गई है।
याचिका में खास तौर पर Section 3(1) के Provisions और First तथा Second Schedules का उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इन प्रावधानों के जरिए IPS Officers की Deputation, Promotion Eligibility, Pay और अन्य Service Conditions से जुड़े पुराने नियमों को जारी रखा गया है।
IPS Deputation को लेकर भी उठाया गया मुद्दा
याचिका में कहा गया है कि नए कानून के तहत Inspector General (IG) स्तर पर IPS Officers की 50 फीसदी Deputation का प्रावधान बरकरार रखा गया है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह Supreme Court के उन निर्देशों के विपरीत है, जिनमें CAPFs में Deputation पर IPS Officers की संख्या को धीरे-धीरे कम करने की बात कही गई थी।
याचिका के मुताबिक, Act की Section 5 में यह भी कहा गया है कि Services को दिए गए Financial Benefits तब तक जारी रहेंगे, जब तक इस संबंध में नए आदेश जारी नहीं किए जाते।
2025 में Supreme Court ने क्या कहा था?
मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सीएपीएफ के कैडरों में वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड (एसएजी) तक प्रतिनियुक्ति के लिए निर्धारित पदों की संख्या को एक तय अवधि, जैसे दो साल के भीतर, धीरे-धीरे कम करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने यह भी कहा कि सीएपीएफ को संगठित समूह ए सेवाओं (ओजीएएस) का हिस्सा माना जाना चाहिए। यह सिद्धांत केवल गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन (एनएफएफयू) के लिए लागू होगा, बल्कि सभी कैडर-संबंधित मामलों के लिए लागू होगा। इसमें कैडर रिव्यू भी शामिल है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नए कानून के जरिए पुराने Supreme Court Judgment के प्रभाव को खत्म करने का प्रयास किया गया है, जबकि उसके मूल आधार को हटाया नहीं गया है।
Articles 14, 16 और 21 के उल्लंघन का दावा
याचिका में CAPF Act 2026 को संविधान के Articles 14, 16 और 21 के उल्लंघन के आधार पर असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं ने Equality, Equal Opportunity और Service Rights से जुड़े संवैधानिक अधिकारों का भी हवाला दिया है।
याचिका में कहा गया है कि नए कानून के कारण सीएपीएफ अधिकारियों ने ग्रुप ए सेंट्रल सिविल सर्विस के रूप में प्रभावी अधिकारों को पूरा किया। इनमें कैडर पदों पर नियुक्ति और पदोन्नति, पदोन्नति पात्रता, वेतन, एनएफएफयू और कैडर समीक्षा जैसे मुद्दे शामिल हैं।
Separation of Powers पर भी सवाल
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि Parliament ने Supreme Court के फैसले के प्रभाव को खत्म करने के लिए ऐसा कानून बनाया है, जो Separation of Powers के सिद्धांत के खिलाफ है। उनका कहना है कि अदालत द्वारा तय किए गए अधिकारों को केवल इस तरह के Legislative Action से समाप्त नहीं किया जा सकता।
याचिका में Sanjay Prakash मामले का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ताओं ने Equality of Status and Opportunity के संवैधानिक सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा है कि समान स्थिति वाले लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता।
अब केंद्र के जवाब पर टिकी नजर
Supreme Court की पीठ ने याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अब मामले में केंद्र का Response सामने आने के बाद अदालत आगे की सुनवाई में CAPF Act 2026 की Constitutional Validity से जुड़े सवालों पर विचार करेगी।
इस मामले का असर CAPFs के अधिकारियों की Promotion, Deputation, Cadre Management, Pay और अन्य Service Conditions पर पड़ सकता है। इसलिए Supreme Court की आगामी सुनवाई को CAPF Officers और केंद्र सरकार, दोनों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
