नई दिल्ली. सड़क दुर्घटनाओं में घायल होने वाले लोगों और मृतकों के परिजनों को अंतरिम मुआवजे का लाभ दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अहम निर्देश दिया है। अदालत ने केंद्र से Compensation to Victims (Interim Relief) Scheme, 2026 का व्यापक प्रचार-प्रसार करने को कहा है, ताकि जरूरतमंद लोगों को इस योजना और मुआवजे के लिए आवेदन करने के अपने अधिकार की जानकारी मिल सके। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने यह निर्देश 16 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान दिया। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या इस योजना के तहत बिना बीमा वाले वाहनों से होने वाली सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को भी राहत मिल सकती है।
योजना की जानकारी आम लोगों तक पहुंचाने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने योजना के सीमित प्रचार पर चिंता जताते हुए कहा कि यदि लोगों को किसी लाभकारी व्यवस्था की जानकारी ही नहीं होगी, तो वे उसका फायदा कैसे उठा पाएंगे। सुनवाई के दौरान अदालत ने इसे एक तरह से ऐसी व्यवस्था बताया, जिसके बारे में आम लोगों को बताया ही नहीं गया है। पीठ ने कहा कि लोगों को कानून और उनके अधिकारों के बारे में जानकारी होना जरूरी है।
यह मामला तब सामने आया, जब सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता और अदालत की सहायता कर रहे एमिकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने बताया कि उन्हें भी योजना के लागू होने की जानकारी नहीं थी। इसके बाद केंद्र सरकार से योजना का व्यापक प्रचार करने को कहा गया, ताकि सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ित और उनके परिवार मुआवजे के लिए उपलब्ध प्रक्रिया को समझ सकें।
Motor Vehicles Act की धारा 164A के तहत बनी योजना
यह योजना Motor Vehicles Act, 1988 की धारा 164A के तहत तैयार की गई है। इस प्रावधान के अंतर्गत केंद्र सरकार सड़क दुर्घटनाओं में मुआवजे का दावा करने वाले लोगों को अंतरिम राहत देने के लिए योजना बना सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल 2025 को केंद्र सरकार को इस संबंध में योजना तैयार करने का निर्देश दिया था। अदालत ने उस समय कहा था कि धारा 164A को 1 अप्रैल 2022 से लागू किए जाने के बावजूद करीब तीन साल तक इसके तहत योजना नहीं बनाई गई थी। मौजूदा सुनवाई के दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल विक्रमजीत बनर्जी ने अदालत को बताया कि सरकार ने 2026 में यह योजना तैयार की है।
बिना बीमा वाले वाहनों से हुए हादसों पर भी मांगा जवाब
सुनवाई के दौरान एक अहम सवाल यह उठा कि क्या योजना का लाभ केवल बीमित वाहनों से हुई दुर्घटनाओं के मामलों में मिलेगा। गौरव अग्रवाल और एक अन्य याचिकाकर्ता ने अदालत के सामने चिंता जताई कि योजना के प्रावधान मुख्य रूप से बीमा कंपनियों के माध्यम से मुआवजा देने वाले मामलों पर केंद्रित दिखाई देते हैं। उन्होंने कहा कि बिना बीमा वाले वाहन से दुर्घटना होने पर पीड़ितों को राहत देने के संबंध में स्पष्टता जरूरी है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से निर्देश लेकर यह स्पष्ट करने को कहा कि बिना बीमा वाले वाहनों से हुई दुर्घटनाओं के पीड़ितों को भी इस योजना के दायरे में शामिल किया गया है या नहीं। यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऐसे मामलों में मुआवजे की जिम्मेदारी और भुगतान की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
Official Gazette में प्रकाशन का भी निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को योजना को जल्द से जल्द Official Gazette में प्रकाशित कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए इसकी औपचारिक जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है। केंद्र को अगली सुनवाई में यह भी बताना होगा कि योजना को जमीन पर लागू करने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि Motor Vehicles Act की धारा 164A के तहत बनाई गई योजना के प्रकाशन के लिए अधिनियम की धारा 212 से जुड़े प्रावधान प्रासंगिक हैं।
मुआवजे की प्रक्रिया को तेज करने पर भी चर्चा
सुनवाई के दौरान सड़क दुर्घटना मुआवजे से जुड़े मामलों के निपटारे में देरी को कम करने के लिए कुछ सुझाव भी रखे गए। इनमें Motor Accident Claims Tribunals (MACT) में लंबित मामलों, हाईकोर्ट में अपीलों और अब तक भुगतान नहीं किए गए मुआवजे के आदेशों से संबंधित आंकड़े जुटाने और सार्वजनिक करने का प्रस्ताव शामिल था।
इसके अलावा, इन आंकड़ों को नियमित रूप से अपडेट करने तथा मुआवजे से जुड़े मामलों के निपटारे के लिए ट्रिब्यूनल में पर्याप्त न्यायिक अधिकारी, कर्मचारी, कोर्टरूम और डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध कराने का सुझाव भी दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से इन प्रस्तावों की जांच कर अगली सुनवाई में अपना पक्ष रखने को कहा है।
सड़क दुर्घटनाओं की वार्षिक रिपोर्ट में देरी पर भी सवाल
इसी सुनवाई के दौरान सड़क दुर्घटनाओं से जुड़े वार्षिक आंकड़ों को समय पर प्रकाशित नहीं किए जाने का मुद्दा भी उठा। अदालत ने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय से दुर्घटनाओं की वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करने में हो रही देरी पर जवाब मांगा। अदालत के सामने बताया गया कि वर्ष 2024 की रिपोर्ट 11 जून 2026 को प्रकाशित हुई थी, जबकि वर्ष 2025 की रिपोर्ट उस समय तक जारी नहीं हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने मंत्रालय को सड़क दुर्घटनाओं की वार्षिक रिपोर्ट निर्धारित समयसीमा के भीतर प्रकाशित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस मामले में अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को निर्धारित की गई है।
इस पूरे मामले में अदालत का जोर इस बात पर है कि सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों के लिए बनाई गई अंतरिम राहत योजना केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित न रहे, बल्कि जरूरतमंद लोगों तक उसकी जानकारी पहुंचे और उसे लागू करने की स्पष्ट व्यवस्था भी तैयार हो।

