नई दिल्ली: राज्यसभा में ट्रांसजेंडर पर्सन्स (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन बिल, 2026 पर विचार और पारित करने के लिए चर्चा शुरू हो गई है। इससे पहले यह बिल लोकसभा में विपक्ष के वॉकआउट के बीच वॉइस वोट से पास हो चुका है।
बिल में क्या हैं बड़े बदलाव
प्रस्तावित बिल में ट्रांसजेंडर की परिभाषा को नया रूप दिया गया है। इसमें स्व-परिचय (self-identification) के प्रावधान को हटाया गया है कई सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान और ट्रांसमास्कुलिन व्यक्तियों को दायरे से बाहर किया गया है जैविक आधार (intersex variations और sexual development) पर परिभाषा तय करने का प्रस्ताव है।
कांग्रेस ने उठाए संवैधानिक सवाल
चर्चा की शुरुआत करते हुए रेणुका चौधरी ने कहा कि यह बिल संविधान द्वारा दिए गए निजता के अधिकार को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान को सरकारी प्रमाणपत्र से जोड़ना गलत है और यह समानता व गरिमा के खिलाफ है।
NALSA फैसले का हवाला
रेणुका चौधरी ने सुप्रीम कोर्ट के 2014 के ऐतिहासिक NALSA बनाम भारत सरकार फैसले का जिक्र किया, जिसमें ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी पहचान खुद तय करने का अधिकार दिया गया था।
अन्य विपक्षी दलों का विरोध
तिरुचि शिवा (DMK) ने कहा कि यह बिल संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन करता है और सुप्रीम कोर्ट में टिक नहीं पाएगा। साकेत गोखले (TMC) ने कहा कि ट्रांसजेंडर समुदाय पहले से भेदभाव झेल रहा है और यह बिल स्थिति को और खराब करेगा। संजय सिंह (AAP) ने इसे समुदाय के लिए “बड़ी निराशा” बताया। मनोज कुमार झा (RJD) ने कहा कि पूर्वाग्रह खत्म होने चाहिए और आत्मनिर्णय का अधिकार छीना नहीं जाना चाहिए। जॉन ब्रिटास ने इसे “काला दिन” बताते हुए बिल को सेलेक्ट कमेटी में भेजने की मांग की। जया बच्चन ने बिना पर्याप्त चर्चा के बिल लाने पर सवाल उठाए।
सरकार का पक्ष: न्याय और सुरक्षा का दावा
बिल का समर्थन करते हुए मेधा कुलकर्णी (BJP) ने कहा कि यह कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को न्याय, गरिमा और कानूनी सुरक्षा देगा। उन्होंने नरेंद्र मोदी का धन्यवाद करते हुए कहा कि यह संशोधन वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुंचाने के लिए जरूरी है।
बहस जारी, फैसला बाकी
राज्यसभा में इस बिल पर चर्चा जारी है और सभी पक्षों के विचार सामने आ रहे हैं। अब देखना होगा कि यह बिल सदन में किस रूप में पारित होता है।
