नई दिल्ली. भारत में महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की बहस नई नहीं है। 1931 में बेगम शाह नवाज़ और सरोजिनी नायडू ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में साफ कहा था कि वे किसी विशेष रियायत की नहीं, बल्कि बराबरी के अधिकार की मांग करती हैं। 1947 में रेणुका राय ने भी भरोसा जताया था कि आज़ादी के बाद महिलाओं को समान अधिकार मिलेंगे। संविधान सभा में यह मुद्दा उठा, लेकिन इसे जरूरी नहीं समझा गया।
आज भी सीमित है महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी
समय के साथ यह स्पष्ट हो गया कि महिलाओं की भागीदारी अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ी। 1951 में केवल 5% सांसद महिलाएं थीं, जो 2024 में भी करीब 14% तक ही पहुंच पाई हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि समान अधिकार के बावजूद प्रतिनिधित्व में असमानता बनी रही।
‘Towards Equality’ रिपोर्ट से बदली सोच
1971 में बनी समिति, जिसकी अध्यक्षता फुलरेणु गुहा ने की, ने 1974 में अपनी रिपोर्ट ‘Towards Equality’ में महिलाओं की खराब सामाजिक और आर्थिक स्थिति को उजागर किया। इस रिपोर्ट ने नीति-निर्माण को प्रभावित किया और महिला सशक्तिकरण की दिशा में नए कदम उठाए गए।
स्थानीय निकायों में मिला आरक्षण, लेकिन संसद में अटका
1989 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रयास किया, लेकिन सफलता नहीं मिली। बाद में 1992-93 के 73वें और 74वें संशोधन लागू हुए, जिससे आज लाखों महिलाएं पंचायत और नगर निकायों में प्रतिनिधित्व कर रही हैं। लेकिन संसद और विधानसभाओं में आरक्षण लंबे समय तक अटका रहा।
2023 में कानून बना, लेकिन असर अब भी बाकी
आखिरकार 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास हुआ, जिसमें लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण का प्रावधान है। हालांकि 2024 के चुनाव में महिलाओं की भागीदारी सीमित रही और कई सीटों पर कोई महिला उम्मीदवार नहीं थी।
जनगणना और परिसीमन बनी बड़ी बाधा
इस कानून के लागू होने को जनगणना और परिसीमन से जोड़ दिया गया है। सरकार लोकसभा सीटों को बढ़ाने की योजना बना रही है, लेकिन जनगणना में देरी और परिसीमन प्रक्रिया के चलते 2029 से पहले इसका लागू होना मुश्किल नजर आ रहा है।
राजनीतिक टकराव के बीच फंसा मुद्दा
इस मुद्दे पर सियासत भी तेज है। भारतीय जनता पार्टी इसे ऐतिहासिक कदम बता रही है, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल प्रक्रिया और समय पर सवाल उठा रहे हैं।
अब वादे को पूरा करने का समय
महिलाओं के आरक्षण का मुद्दा दशकों पुराना है और अब इसे लागू करने की जिम्मेदारी सभी दलों की है। यह केवल कानून नहीं, बल्कि देश की आधी आबादी के प्रतिनिधित्व का सवाल है, जिसे अब टाला नहीं जा सकता।
