नई दिल्ली. भारत में खेती लंबे समय से देश की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण आजीविका की मजबूत आधारशिला रही है। कृषि क्षेत्र ने लगातार विकास किया है, लेकिन आने वाले वर्षों में इसकी उत्पादकता बनाए रखने के लिए केवल ज्यादा उत्पादन पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए मिट्टी की सेहत, पानी की उपलब्धता, जैव विविधता और बदलते मौसम के बीच खेती की क्षमता को मजबूत करना भी जरूरी है। इसी दिशा में Regenerative Agriculture यानी पुनर्योजी कृषि एक महत्वपूर्ण ऑप्शन के रूप में सामने आ रही है।
देश के अलग-अलग हिस्सों में किसान अब प्राकृतिक खेती, कृषि-वानिकी, सूक्ष्म-सिंचाई, एकीकृत कृषि प्रणालियां और वैज्ञानिक मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन जैसी तकनीकों को अपना रहे हैं। सरकार की विभिन्न योजनाओं के जरिए भी इन तरीकों को बढ़ावा दिया जा रहा है। मार्च 2026 तक देश में Natural Farming के तहत 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को क्लस्टर के रूप में कवर किया जा चुका है और 18.19 लाख किसान इससे जुड़ चुके हैं। वहीं, मई 2026 तक Per Drop More Crop के तहत करीब 109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को माइक्रो-इरिगेशन के दायरे में लाया गया है। इसके अलावा, मार्च 2026 तक 25.89 करोड़ Soil Health Cards तैयार किए जा चुके हैं।
क्यों जरूरी हो रही है Regenerative Agriculture?
भारत के कृषि और संबद्ध क्षेत्रों ने पिछले वर्षों में उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष 2016 से 2025 के बीच कृषि क्षेत्र ने 4.45 प्रतिशत की दशकीय वृद्धि दर्ज की, जो पिछले दशकों की तुलना में सबसे अधिक रही। हालांकि, इस विकास को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए खेती की पारिस्थितिक नींव को मजबूत करना जरूरी है।
लगातार एक ही जमीन पर खेती, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अधिक इस्तेमाल तथा अनियमित बारिश जैसी परिस्थितियों ने कई क्षेत्रों में मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। दूसरी ओर, Heatwaves, सूखे और अत्यधिक बारिश जैसी घटनाएं किसानों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर रही हैं। इसका सीधा असर खेती की लागत और किसानों की आय पर पड़ता है।
ऐसे समय में Regenerative Agriculture खेती की जमीन को केवल इस्तेमाल करने के बजाय उसे दोबारा स्वस्थ बनाने पर जोर देती है। इसका उद्देश्य Soil Health को बेहतर करना, जैव विविधता बढ़ाना और खेती को Climate Change के प्रभावों के प्रति अधिक मजबूत बनाना है।
Regenerative Agriculture क्या है?
Regenerative Agriculture एक ऐसा Holistic Farming Approach है, जिसमें मिट्टी की सेहत को कृषि व्यवस्था के केंद्र में रखा जाता है। इसका उद्देश्य केवल मौजूदा स्थिति को बनाए रखना नहीं, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता, जैव विविधता और पूरे कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर बनाना है।
स्वस्थ मिट्टी पानी को ज्यादा समय तक रोक सकती है, पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ा सकती है और फसलों को प्रतिकूल मौसम से मुकाबला करने में मदद कर सकती है। इस प्रणाली में मिट्टी की अनावश्यक जुताई कम करने, जमीन को हमेशा ढके रखने, पौधों की जड़ों को सक्रिय बनाए रखने, पशुधन को खेती से जोड़ने और रासायनिक इनपुट पर निर्भरता घटाने जैसे उपायों पर जोर दिया जाता है।
पानी और संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल
Regenerative Farming में Water Use Efficiency को विशेष महत्व दिया जाता है। Micro-Irrigation के तहत Drip और Sprinkler जैसी तकनीकों के जरिए पानी को सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। इससे पानी की बर्बादी कम होती है और सूखे या Water Stress की स्थिति में फसलों को बचाने में मदद मिलती है।
इसके साथ ही Farm Mechanization भी संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद करती है। आधुनिक कृषि मशीनों के जरिए पानी, ईंधन और उर्वरकों का इस्तेमाल अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है। इससे इनपुट की बर्बादी कम होने के साथ खेती के पर्यावरणीय प्रभाव को भी घटाने में मदद मिलती है।
Soil Health को मजबूत करने पर जोर
Regenerative Agriculture का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा Soil and Nutrient Management है। Nitrogen Fertilizer Management के जरिए फसल की जरूरत के मुताबिक उर्वरक की मात्रा और इस्तेमाल का समय तय किया जाता है। इससे फसल की उत्पादकता बनाए रखने के साथ Nitrous Oxide Emissions को कम करने में मदद मिलती है।
इसके अलावा Green Manuring, Cover Cropping और Mulching जैसी तकनीकें भी मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। Green Manuring से मिट्टी में Organic Matter और पोषक तत्व बढ़ते हैं, जबकि Cover Crops मिट्टी को कटाव से बचाने और Soil Organic Carbon बनाए रखने में मदद करती हैं। Mulching से मिट्टी में नमी बनी रहती है, तापमान नियंत्रित होता है और खरपतवार की समस्या भी कम होती है।
Natural Farming से कम हो सकती है किसानों की लागत
Natural Farming भारत में Regenerative Agriculture का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभर रही है। इसमें रासायनिक इनपुट की जगह स्थानीय और जैविक संसाधनों से तैयार किए गए Beejamrit, Jeevamrit, GhanJeevamrit, Neemastra और Dashparni जैसे Bio-Inputs का इस्तेमाल किया जाता है।
इस प्रणाली में पारंपरिक बीज, मल्चिंग, Multi-Cropping, Cover Cropping और कम जुताई जैसे तरीकों को बढ़ावा दिया जाता है। खेतों में पेड़ों और पशुधन को शामिल करने से भी Soil Health और Biodiversity को मजबूत किया जा सकता है। इससे किसानों की बाहरी इनपुट पर निर्भरता कम करने और खेती की लागत घटाने में मदद मिल सकती है।
Integrated Farming से बढ़ेगी किसानों की Climate Resilience
Integrated Farming Systems (IFS) में फसल उत्पादन के साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, Agroforestry और Apiculture जैसी गतिविधियों को एक ही कृषि प्रणाली में जोड़ा जाता है। इससे किसानों के लिए आय के कई स्रोत तैयार होते हैं और किसी एक फसल के खराब होने की स्थिति में आर्थिक जोखिम कम होता है।
Crop Rotation, Intercropping, Multi-Cropping और Mixed Farming जैसी तकनीकें संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल में मदद करती हैं। यही वजह है कि Integrated Farming को Flood, Drought और अन्य Climate Extremes के बीच किसानों की Climate Resilience बढ़ाने वाला प्रभावी तरीका माना जा रहा है।
Agroforestry से खेती के साथ बढ़ेगी अतिरिक्त आय
Agroforestry में पेड़ों को फसलों और अन्य कृषि गतिविधियों के साथ जोड़ा जाता है। इससे किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिल सकता है। साथ ही पेड़ मिट्टी में नमी बनाए रखने, स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने और Carbon Storage बढ़ाने में मदद करते हैं।
Rainfed Areas में Agroforestry का महत्व और बढ़ जाता है, क्योंकि यहां खेती बारिश पर अधिक निर्भर रहती है। पेड़ और फसल आधारित प्रणाली भूमि को बेहतर बनाने के साथ अनिश्चित बारिश और बदलते मौसम के प्रभावों को कम करने में मदद कर सकती है।
Regenerative Farming से पर्यावरण और किसानों दोनों को फायदा
Regenerative Agriculture के कई Environmental, Economic और Social Benefits सामने आते हैं। स्वस्थ मिट्टी में Organic Matter बढ़ने से Soil Fertility और Water Retention बेहतर हो सकती है। इससे मिट्टी का कटाव और पानी के साथ पोषक तत्वों के बहने की समस्या भी कम होती है।
इसके अलावा, ऐसी कृषि प्रणालियां Pollinators, Beneficial Insects और Soil Microorganisms के लिए बेहतर वातावरण तैयार करती हैं। इससे Biodiversity मजबूत होती है। बेहतर Soil Health से रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई पर निर्भरता कम हो सकती है, जिससे किसानों की Input Cost घटने और Net Income में सुधार की संभावना बढ़ती है।
Climate Change से मुकाबले में भी मददगार
Regenerative Agriculture का सीधा संबंध Climate Action से भी है। स्वस्थ मिट्टी अधिक Carbon Store करने में सक्षम होती है और खेती से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान को कम करने में मदद कर सकती है। यही कारण है कि Regenerative Farming को Climate-Resilient Agriculture की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
जलवायु-लचीला कृषि में उन्नत उर्वरक का उपयोग, बेहतर कीट प्रबंधन, कुशल जल प्रबंधन, मिट्टी की नमी संरक्षण और भूमि की तैयारी जैसे तकनीक को शामिल किया गया है। इसके साथ जल-बंटवारा समूह, बीज और चारा प्रणाली, सामुदायिक नर्सरी और सामूहिक विपणन जैसे किसानों की क्षमता को बढ़ाया जाता है।
सरकार की योजनाएं दे रही हैं पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा
भारत सरकार ने किसानों को प्राकृतिक खेती, जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई, कृषि वानिकी और मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन में मदद के लिए कई उद्देश्य लागू किए हैं। इनमें राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (एनएमएनएफ), परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई), प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी), वर्षा आधारित क्षेत्र विकास कार्यक्रम (आरएडी), कृषि वानिकी घटक और मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना प्रमुख हैं।
प्राकृतिक खेती पर राष्ट्रीय मिशन
2024 में शुरू किया गया National Mission on Natural Farming किसानों को धीरे-धीरे Natural Farming की ओर बढ़ने के लिए सहायता प्रदान करता है। योजना के तहत पात्र किसानों को दो वर्षों तक प्रति एकड़ प्रति वर्ष 4,000 रुपये का Output-Based Incentive दिया जाता है, जिसकी सीमा एक एकड़ तक है।
किसानों को Jeevamrit और Beejamrit जैसे Bio-Inputs आसानी से उपलब्ध कराने के लिए देश में 10,000 Bio-input Resource Centres स्थापित करने का प्रावधान किया गया है। 5 मार्च 2026 तक देश में 18,786 Natural Farming Clusters बनाए जा चुके थे। इन क्लस्टर्स में 8.80 लाख हेक्टेयर क्षेत्र शामिल था और 18.19 लाख किसान इससे जुड़े थे।
Organic Farming को PKVY से मिल रहा समर्थन
Paramparagat Krishi Vikas Yojana (PKVY) को 2015 में शुरू किया गया था। यह योजना Organic Farming अपनाने वाले किसानों को प्रशिक्षण, Certification और Market Access से जुड़ी सहायता प्रदान करती है। योजना के तहत तीन वर्षों के लिए किसानों को प्रति हेक्टेयर 31,500 रुपये तक की सहायता दी जाती है।
31 अक्टूबर 2025 तक PKVY के तहत देश में कुल 16.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया जा चुका था।
Micro-Irrigation से पानी की बचत
Per Drop More Crop (PDMC) योजना 2015-16 से लागू है। इसका उद्देश्य Drip और Sprinkler Irrigation के जरिए खेतों में पानी के इस्तेमाल की दक्षता बढ़ाना है। योजना के तहत Small and Marginal Farmers को Micro-Irrigation System लगाने के लिए 55 प्रतिशत और अन्य किसानों को 45 प्रतिशत वित्तीय सहायता दी जाती है।
मई 2026 तक PDMC के तहत करीब 109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र कवर किया जा चुका था और केंद्र सरकार की ओर से 26,325 करोड़ रुपये की सहायता जारी की गई थी।
Integrated Farming को Rainfed Areas में बढ़ावा
Rainfed Area Development Programme (RAD) के तहत Integrated Farming Systems को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें Crops के साथ Horticulture, Livestock, Fisheries और Apiculture जैसी गतिविधियों को जोड़ा जाता है।
इस योजना के तहत करीब 20 हेक्टेयर के क्लस्टर विकसित किए जाते हैं। किसानों को Integrated Farming System अपनाने के लिए प्रति परिवार 30,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाती है। योजना की शुरुआत से दिसंबर 2025 तक राज्यों को 2,251.98 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता दी जा चुकी थी। इस दौरान 9.53 लाख हेक्टेयर क्षेत्र और 15.73 लाख किसान योजना से लाभान्वित हुए।
Agroforestry से बढ़ेगा Green Cover और Farm Income
Agroforestry Component के तहत किसानों को गुणवत्तापूर्ण पौध सामग्री उपलब्ध कराने के लिए नई नर्सरी स्थापित करने, मौजूदा नर्सरी में पौधे तैयार करने, Tissue Culture Units, Skill Development और Research जैसी गतिविधियों को समर्थन दिया जा रहा है।
2025-26 में 31 अक्टूबर 2025 तक 27 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 78.31 करोड़ रुपये की मंजूरी दी गई थी। इस दौरान 135 नई नर्सरियां स्थापित की गईं और 614 मौजूदा नर्सरियों में पौध उत्पादन किया गया। इन नर्सरियों में करीब 176.59 लाख पौधे तैयार किए गए, जिससे लगभग 25,693 किसानों को लाभ मिला।
Soil Health Card से किसानों को मिलेगी वैज्ञानिक सलाह
2015 में शुरू हुई Soil Health Card Scheme किसानों को उनकी जमीन की वैज्ञानिक जांच के आधार पर Soil Health Report उपलब्ध कराती है। इसमें मिट्टी के 12 प्रमुख मानकों की जांच की जाती है, जिनमें Macro Nutrients, Micro Nutrients और अन्य महत्वपूर्ण Soil Properties शामिल हैं।
Soil Health Card किसानों को यह समझने में मदद करता है कि उनकी जमीन में कौन से पोषक तत्व कितनी मात्रा में मौजूद हैं और फसल के लिए किस तरह के Fertilizers, Bio-Fertilizers और Organic Inputs का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
13 मार्च 2026 तक देश में इस योजना के तहत 25.89 करोड़ Soil Health Cards तैयार किए जा चुके थे। इसके अलावा Balanced Fertilizer Use को बढ़ावा देने के लिए करीब 7.17 लाख Demonstrations आयोजित किए गए और 70,002 Krishi Sakhis को Soil Health Advisory से जुड़ी जानकारी देने के लिए प्रशिक्षित किया गया।
स्वस्थ मिट्टी से मजबूत होगा भारत का कृषि भविष्य
भारत में Regenerative Agriculture धीरे-धीरे खेती की पारंपरिक सोच को एक नए मॉडल की ओर ले जा रही है। इसका लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि मिट्टी, पानी, जैव विविधता और किसानों की आय के बीच बेहतर संतुलन बनाना है। Natural Farming, Agroforestry, Micro-Irrigation और Integrated Farming जैसी व्यवस्थाएं खेती को अधिक Resource-Efficient और Climate-Resilient बनाने में मदद कर रही हैं।
सरकारी योजनाओं के जरिए इन तरीकों को बड़े स्तर पर किसानों तक पहुंचाया जा रहा है। आने वाले समय में यदि अधिक किसान Regenerative Practices को अपनाते हैं, तो इससे Soil Health में सुधार के साथ खेती की लागत, जल संकट और Climate Risks को कम करने में भी मदद मिल सकती है। मजबूत मिट्टी से मजबूत खेत और मजबूत खेतों से किसानों की सुरक्षित आजीविका की दिशा में भारत आगे बढ़ सकता है।
