नई दिल्ली : झारखंड से राज्यसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) समर्थित नेता Parimal Nathwani की जीत ने संसद के उच्च सदन का राजनीतिक समीकरण बदल दिया है। इस जीत के साथ भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले NDA की राज्यसभा में ताकत बढ़कर 153 सदस्यों तक पहुंच गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह जीत केवल एक सीट हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले समय में केंद्र सरकार के लिए महत्वपूर्ण संवैधानिक और नीतिगत फैसलों की राह को भी आसान बना सकती है।
नथवानी की जीत ऐसे समय में हुई है जब झारखंड में सत्तारूढ़ INDIA गठबंधन के भीतर क्रॉस वोटिंग के आरोपों ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। इस नतीजे ने विपक्षी एकजुटता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्यों अहम है राज्यसभा का आंकड़ा?
संसद में सामान्य विधेयकों को पारित कराने के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त होता है, लेकिन संविधान संशोधन विधेयकों के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। ऐसे विधेयकों को पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत की भी जरूरत होती है।
यही कारण है कि राज्यसभा में संख्या बल किसी भी सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। आने वाले वर्षों में महिला आरक्षण, परिसीमन (Delimitation) और अन्य संभावित संवैधानिक सुधारों को लेकर चर्चा तेज होने की संभावना है। ऐसे में राज्यसभा में मजबूत स्थिति केंद्र सरकार के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है।
NDA की ताकत बढ़कर 153 पर पहुंची
परिमल नथवानी की जीत के बाद NDA का आंकड़ा राज्यसभा में 153 तक पहुंच गया है। हालांकि वर्तमान में राज्यसभा की प्रभावी सदस्य संख्या 241 है क्योंकि पश्चिम बंगाल की चार सीटें खाली हैं। ये सीटें तृणमूल कांग्रेस के कुछ सांसदों के इस्तीफे के बाद रिक्त हुई हैं।
राजनीतिक अनुमान है कि इन चारों सीटों पर भाजपा को फायदा मिल सकता है। यदि ऐसा होता है तो NDA का आंकड़ा बढ़कर 157 तक पहुंच सकता है। इसके बावजूद संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक सुरक्षित बहुमत के स्तर तक पहुंचने के लिए गठबंधन को अभी भी कुछ और समर्थन की जरूरत होगी।
NDA में कौन-कौन सी पार्टियां शामिल हैं?
राज्यसभा में NDA की मौजूदा ताकत में सबसे बड़ा योगदान भाजपा का है, जिसके 115 सदस्य हैं। इसके अलावा गठबंधन में तेलुगु देशम पार्टी (TDP), जनता दल यूनाइटेड (JDU), एआईएडीएमके (AIADMK), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP), शिवसेना, असम गण परिषद (AGP), राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM), पीएमके, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (A), जन सेना पार्टी, नेशनल पीपुल्स पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियां शामिल हैं।
इसके अलावा कुछ निर्दलीय और मनोनीत सदस्य भी NDA का समर्थन करते हैं, जिससे गठबंधन की कुल ताकत लगातार मजबूत बनी हुई है।
INDIA गठबंधन अभी भी काफी पीछे
विपक्षी INDIA गठबंधन की राज्यसभा में कुल ताकत लगभग 63 सदस्यों की है। इसमें कांग्रेस के 30 सदस्य सबसे अधिक हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय जनता दल और अन्य सहयोगी दल शामिल हैं।
हालांकि विपक्ष कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश करता रहा है, लेकिन संख्या बल के मामले में वह NDA से काफी पीछे दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि विपक्ष को किसी भी बड़े विधायी मुद्दे पर गैर-गठबंधन क्षेत्रीय दलों का समर्थन जुटाने की आवश्यकता पड़ सकती है।
क्षेत्रीय दल बन सकते हैं ‘किंगमेकर’
राज्यसभा के मौजूदा राजनीतिक गणित में कुछ क्षेत्रीय दलों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इनमें द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK), बीजू जनता दल (BJD), वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP), आम आदमी पार्टी (AAP), भारत राष्ट्र समिति (BRS), बहुजन समाज पार्टी (BSP) और अन्य दल शामिल हैं।
इन पार्टियों का किसी भी बड़े विधेयक पर रुख सरकार और विपक्ष दोनों के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। विशेष रूप से YSR कांग्रेस पार्टी के चार सदस्य ऐसे हैं, जिन्होंने कई महत्वपूर्ण मौकों पर केंद्र सरकार का समर्थन किया है।
YSRCP का समर्थन बदल सकता है पूरा समीकरण
राजनीतिक जानकारों के अनुसार यदि वाईएसआर कांग्रेस पार्टी भविष्य में भी मुद्दा आधारित समर्थन जारी रखती है तो NDA की प्रभावी ताकत 161 तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में दो-तिहाई बहुमत के लिए गठबंधन को केवल कुछ अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी।
यानी सरकार के लिए क्षेत्रीय दलों का सहयोग किसी भी संवैधानिक संशोधन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
लोकसभा में अभी भी चुनौती बरकरार
हालांकि राज्यसभा में NDA की स्थिति लगातार मजबूत हो रही है, लेकिन लोकसभा में तस्वीर कुछ अलग है। संविधान संशोधन के लिए लोकसभा में भी विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। 543 सदस्यीय लोकसभा में किसी भी संवैधानिक संशोधन को पारित कराने के लिए कम से कम 363 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।
ऐसे में केवल राज्यसभा में मजबूत स्थिति होना पर्याप्त नहीं है। यदि केंद्र सरकार भविष्य में बड़े संवैधानिक सुधारों को आगे बढ़ाना चाहती है तो उसे लोकसभा में भी व्यापक राजनीतिक समर्थन जुटाना होगा।
आने वाले समय में बढ़ सकती है राजनीतिक सक्रियता
परिमल नथवानी की जीत ने यह संकेत दे दिया है कि राज्यसभा में NDA धीरे-धीरे अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। हालांकि दो-तिहाई बहुमत का लक्ष्य अभी पूरी तरह हासिल नहीं हुआ है, लेकिन गठबंधन उस दिशा में लगातार आगे बढ़ रहा है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में राज्यसभा की संख्या और क्षेत्रीय दलों की भूमिका राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में रहेगी। विशेष रूप से संवैधानिक सुधारों, महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर संसद का गणित सरकार और विपक्ष दोनों की रणनीति तय करेगा।

