अमेरिका विरोधी तिकड़ी और चीन विरोधी चौकड़ी: भारत को बचके गुजरना होगा महाशक्तियों की रार से

नई दिल्ली.  वर्ष 2017 में भारत अचानक चीन और अमेरिका के बीच उभरती महाशक्तियों की होड़ में फंसता नज़र आया. 2013 में राष्ट्रपति जी जिनपिंग के सत्ता में आने के पहले से ही उभरती महाशक्ति के बतौर चीन ने आक्रामक विदेश नीति अपना ली थी. लेकिन हालिया दौर में उसने ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और ‘चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा’ (CPEC) के माध्यम से एशिया और यूरोप के भू-राजनैतिक समीकरणों को अपने पक्ष में करने की ज़बरदस्त मुहिम शुरू कर दी है.

बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव यूरोप और अफ्रीका के मुख्य व्यापार मार्गों को ट्रेन, सड़क और समुद्री रास्तों के जरिये चीन से जोड़ने की एक अति महत्वाकांछी योजना है, वहीं CPEC चीन से पाकिस्तान के ग्वादर समुद्र तट बनने वाले चीनी स्वामित्व वाले रास्ते का नाम है. इन दोनों के जरिये चीन सदियों पुराने ‘रेशम रोड’ को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है और इसके माध्यम से यूरोप और एशिया के बाज़ारों तक अपना सामान, और जरूरत पड़ने पर सैन्य साजोसामान पहुंचा सकने की क्षमता विकसित कर रहा है. इन प्रयासों पर अमेरिकी चिंता बढ़नी स्वाभाविक ही है. उसपर नए राष्ट्रपति ट्रम्प के अधीन अमेरिका भी वैश्विक मामलों में अधिक हस्तक्षेप की विदेश नीति पर अमल करने के रास्ते पर है. ऐसे में दोनों के बीच वैश्विक दबदबे को लेकर मुकाबलेबाज़ी तेज हो गयी है जिसने भारत के लिए नयी चुनौतियों और नए अवसरों को जन्म दिया है.

भारत के सामने मौजूद हैं दोहरे अवसर

अपने पहले ही साल में अमेरिका की ट्रम्प सरकार ने “इंडो-पेसिफिक” क्षेत्र में प्रजातान्त्रिक देशों के संभावित गठजोड़ को परिभाषित करते हुए भारत को एक प्रमुख वैश्विक ताकत माना है और उसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण जगह दी है. 2007 में राष्ट्रपति जोर्ज बुश के वक़्त चर्चित हुई इंडो-पेसिफिक चौकड़ी, यानि अमेरिका-भारत-जापान-ऑस्ट्रेलिया के बीच साझे सुरक्षा समझौते की दशक भर पुरानी योजना को ट्रम्प सरकार अमली जामा पहनाना चाहती है. इस योजना के वास्तविकता में आने में यूं अभी काफी दिक्कतें हैं, लेकिन चूँकि इस चौकड़ी के चारों भागीदार देशों में चीन की गतिविधियों और बढ़ते हस्तक्षेप को लेकर चिंतायें हैं, इसलिए देर-सवेर इसके आकार लेने की प्रबल संभावनाएं हैं.

इस प्रस्तावित चौकड़ी के बरक्स एक दूसरी तिकड़ी है जिसे RIC फोरम भी कहा जाता है. रूस-भारत और चीन के प्रथमाक्षरों से बनने वाले RIC (Russia-India-China) समूह ने मूल रूप से अमरीकी दबदबे के खिलाफ 2002 में आकार लिया था और पिछले वर्ष इसे 15 साल पूरे हो गए. इस तिकड़ी का एक घटक रूस हमेशा से ही भारत का भरोसेमंद मित्र देश रहा है.

इन दोनों समूहों में पहला चीन के खिलाफ है और दूसरा अमेरिका के. लेकिन दोनों में ही भारत एक जरुरी हिस्सा है. गुट-निरपेक्षता की विदेश नीति के बाद अपनाई गयी “बहु गुट-सापेक्षता” की नीति के चलते हुए बदलावों के दौर में भारत इस स्थिति में है कि दोनों ही समूहों में उसकी एक खास जगह है.

इस विशिष्ट स्थिति ने भारत से सामने दोनों समूहों के बीच के हितों के टकराव को संतुलित करने की चुनौती पेश कर दी है. लेकिन साथ ही साथ यह विशिष्ट स्थिति नए अवसर भी पैदा कर रही है. क्योंकि इन दोनों समूहों के बीच टकराव कम करने और सहयोग बढ़ाने की क्षमता मौजूदा हालत में सिर्फ भारत के ही पास है.

महाशक्तियों के जटिल समीकरण

मगर चीन-अमेरिका के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और रूस-अमेरिका के बीच शीत युद्ध के समय से जारी मुकाबले के चलते दोनों के बीच सहयोग की सम्भावना सिर्फ सम्भावना भर ही मालूम होती है. इतिहास बताता है कि महाशक्तियों के बीच की लड़ाई क्षेत्र विशेष में सीमित न रह के दुनिया भर में फैली रहती है और एक दूसरे का मुकाबला वे अपने सहयोगियों के जरिये करती हैं. अमेरिका के विरोध में खड़े होने के चलते रूस और चीन में नजदीकी का बढ़ना स्वाभाविक ही है, जबकि अपने आकार और संसाधनों के चलते भारत, अमेरिका के लिए चीन के खिलाफ एक जरुरी सहयोगी का दर्जा रखता है. ऐसे में भारत और चीन के बीच दशकों पुराने सीमा-विवाद का जारी रहना अमेरिका के हित में है. लेकिन अमेरिका का मोहरा बनकर क्षेत्र में रहना, या महाशक्तियों की आपसी रार में फंसना कहीं से भी भारत के हित में नहीं है.

ऐसे में भारत चीन से सबक ले सकता है. 1970 और 80 के दशकों में, जबकि महाशक्तियों की लड़ाई और शीत युद्ध चरम पर था तब भी चीन ने स्वतन्त्र विदेश नीति अपनाए रखी और न सिर्फ देश को आर्थिक पिछड़ेपन और गरीबी से मुक्ति दिलाने पर ज्यादा ध्यान दिया, बल्कि दूसरे देशों की गलतियों से सबक भी लिया. 1990 के बाद से ही चीन तेज आर्थिक विकास का आदी रहा है और वैश्विक जानकारों का मानना है कि अगर इसमें कोई कमी आई तो चीन ज्यादा आक्रामक विदेश और सैन्य नीति का रास्ता अपना सकता है.

बहरहाल, शीत युद्ध के दौर के मुकाबले अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा वाले आज के दौर में एक महत्वपूर्ण बदलाव ये है कि आज का दौर दो ध्रुवीय होने के बजाय कई उभर रहे ध्रुवों वाला है, और एक-दूसरे के साथ इन तमाम उभरते ध्रुवों के जटिल सम्बन्ध-समीकरण हैं. इनमें से कोई तकनीकी रूप से श्रेष्ठ है तो कोई आर्थिक या सैन्य रूप से. लेकिन पुराने वक़्त के मुकाबले इस दौर की महाशक्ति के लिए सिर्फ आर्थिक-सैन्य और तकनीकी श्रेष्ठता नहीं, बल्कि सॉफ्ट पॉवर और स्मार्ट पॉवर होना भी जरुरी है. वैश्वीकरण ने ऐसी कई नए तरह की शक्ति समीकरण और संभावनाएं पैदा कर दी हैं जिन्हें दुनिया के देशों ने पहले कभी अनुभव नहीं किया था.

सामरिक लचीलेपन की नीति

आज़ादी के बाद भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति अपनायी, जबकि पाकिस्तान ने उस गुट से जुड़ने की जो उसे सबसे ज्यादा संसाधन मुहैया करा सके. अगर पलट कर देखें तो आत्म निर्भरता और महाशक्तियों से कम से कम राजनैतिक जुड़ाव की भारतीय नीति सफल रही जबकि पाकिस्तान लगातार पिछडता रहा.

गुट निरपेक्षता की नीति छोड़ने के बाद भी भारत हमेशा ही महाशक्तियों के एकाधिकार और वर्चस्व के खिलाफ रहा है, फिर चाहे वह अमेरिकी वर्चस्व के खिलाफ RIC की तिकड़ी में भागीदारी हो या चीनी वर्चस्व के खिलाफ अमेरिकी चौकड़ी पर सहमति. मौजूदा दौर में भी भारत को किसी एक गुट के साथ पक्के तौर पर जुड़ने से बचना चाहिए. तिकड़ी या चौकड़ी या किसी भी अन्य आर्थिक समूह से किसी मुद्दे पर सहमति-असहमति, सहयोग अथवा विरोध का निर्णय, भारत को राष्ट्रीय हितों और तात्कालिक-दीर्घकालिक नफे-नुकसान का ध्यान रखकर ही करना चाहिए.

इसके लिए जरुरी होगा कि भारत सर्वप्रथम अपने हितों और उनको सुनिश्चित करने की संभावित रणनीतियां तय करे और समूहों या देशों के साथ काम करते हुए इनके अनुरूप सामरिक लचीलेपन की नीति पर अमल करे. इसके लिए वैश्विक राजनीति में किसी एक के बजाय सभी ध्रुवों और समूहों ही नहीं, बल्कि ज्यादा से ज्यादा देशों के साथ भी आपसी सहयोग और विश्वास का सम्बन्ध कायम करने की जरुरत.

नवनीत भूषण: लेखक भूतपूर्व रक्षा वैज्ञानिक हैं और मौजूदा समय में ‘क्रेफिटी कंसल्टिंग’ फर्म के संस्थापक निदेशक के बतौर कार्यरत हैं.