नई दिल्ली. देश के शीर्ष नौकरशाहों की संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करने की व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी अधिकारियों को जवाबदेह बनाना और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना है। लेकिन हालिया संपत्ति घोषणाओं के विश्लेषण में कई कमियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, 131 सचिव स्तर के अधिकारियों में से 102 की ओर से घोषित संपत्तियों की जानकारी की समीक्षा की गई। इसमें 244 संपत्तियों में से 115 के क्षेत्रफल या माप का उल्लेख नहीं मिला। वहीं, कई संपत्तियों की मौजूदा कीमत भी स्पष्ट नहीं की गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब संपत्ति का पूरा विवरण ही उपलब्ध नहीं है, तो अधिकारियों की घोषित संपत्ति और उनकी आय के बीच तालमेल की जांच कैसे होगी?
क्यों शुरू हुई थी संपत्ति सार्वजनिक करने की व्यवस्था?
सरकारी अधिकारियों के लिए अपनी अचल संपत्ति का विवरण देना सेवा आचरण नियमों का हिस्सा है। इसमें अधिकारी, उनके पति या पत्नी और आश्रितों के नाम पर मौजूद जमीन, मकान और अन्य अचल संपत्तियों की जानकारी शामिल होती है। इसका उद्देश्य संपत्ति के ब्योरे को सार्वजनिक करना है, ताकि पारदर्शिता बढ़े और जरूरत पड़ने पर कोई भी व्यक्ति इन जानकारियों की जांच कर सके।
यह व्यवस्था सूचना का अधिकार (RTI) के तहत उठाई गई मांगों, लोकपाल की स्थापना की मांग और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद जवाबदेही बढ़ाने के प्रयासों से जुड़ी रही है। नियमों के अनुसार, अधिकारियों को हर साल 31 जनवरी तक संपत्ति का विवरण जमा करना होता है और इसे 31 मार्च तक सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
इस समीक्षा में केंद्र सरकार के सचिवों और राज्यों के मुख्य सचिवों के स्तर के अधिकारियों के रिकॉर्ड शामिल हैं। सचिव केंद्र सरकार के वरिष्ठतम प्रशासनिक अधिकारियों में गिने जाते हैं, जबकि मुख्य सचिव राज्य की नौकरशाही का नेतृत्व करते हैं।
कई संपत्तियों की कीमत का भी पता नहीं
संपत्ति के क्षेत्रफल या माप के अलावा उनके मूल्य की जानकारी में भी कमी दिखाई दी है। समीक्षा में शामिल 244 संपत्तियों में से केवल 129 के लिए ही मौजूदा कीमत का विवरण दिया गया। बाकी संपत्तियों के सामने ‘जानकारी नहीं’, ‘सर्किल रेट के अनुसार’, ‘मूल्यांकन नहीं हुआ’ या ‘कोई आकलन नहीं किया गया’ जैसे जवाब दर्ज थे।
सर्किल रेट वह न्यूनतम सरकारी दर होती है, जिसका इस्तेमाल जमीन या संपत्ति के मूल्यांकन के लिए किया जाता है। हालांकि, केवल सर्किल रेट का उल्लेख होने से किसी संपत्ति की वास्तविक मौजूदा कीमत का स्पष्ट पता नहीं चलता।
संपत्ति के क्षेत्रफल और मूल्य की जानकारी अधूरी रहने से यह आकलन करना मुश्किल हो जाता है कि अधिकारी की घोषित संपत्ति उसकी ज्ञात आय के अनुरूप है या नहीं। यही वजह है कि संपत्ति विवरण सार्वजनिक करने की व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
10 अधिकारियों ने बताया कि उनके पास स्वयं अर्जित संपत्ति नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक, 10 अधिकारियों ने स्वयं अर्जित संपत्ति नहीं होने की घोषणा की है। इनमें जम्मू-कश्मीर कैडर के एक IAS अधिकारी भी शामिल हैं, जिन्होंने 2011 से हर साल अपनी स्वयं अर्जित संपत्ति शून्य बताई है।
दूसरी ओर, 44 अधिकारियों या उनके जीवनसाथियों के पास तीन या उससे अधिक स्वयं अर्जित संपत्तियां हैं। सबसे अधिक संपत्तियां घोषित करने वाले अधिकारी के पास आठ संपत्तियां दर्ज हैं। सात अधिकारियों ने पांच-पांच, जबकि 13 अधिकारियों ने चार-चार संपत्तियों की जानकारी दी है।
संपत्तियों के प्रकार पर नजर डालें तो इनमें 219 आवासीय संपत्तियां, तीन व्यावसायिक संपत्तियां और 22 कृषि भूमि के हिस्से शामिल हैं। इनमें से ज्यादातर संपत्तियां दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) और विभिन्न राज्यों की राजधानियों में स्थित बताई गई हैं। कई संपत्तियां सहकारी आवास समितियों में भी हैं।
लोकपाल कानून के तहत नियम अब तक अधूरे
संपत्ति के खुलासे को लेकर लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 की धारा 44 भी महत्वपूर्ण है। इस प्रावधान का उद्देश्य सरकारी सेवकों की संपत्ति और देनदारियों की घोषणा सुनिश्चित करना था। चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों और मंत्रियों के लिए भी संपत्ति का विवरण देना अनिवार्य है।
हालांकि, दिसंबर 2016 में किए गए संशोधन के बाद घोषणाओं के प्रारूप और समय-सीमा से जुड़े कुछ पहलुओं को भविष्य में अधिसूचित किए जाने वाले नियमों पर छोड़ दिया गया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इन नियमों की अधिसूचना अब तक लंबित है।
इसका असर यह है कि संपत्ति की घोषणा से जुड़ी व्यवस्था पूरी तरह स्पष्ट और प्रभावी रूप में लागू नहीं हो पाई है। जब तक विवरण देने का एक समान प्रारूप और उसके सत्यापन की स्पष्ट प्रक्रिया नहीं होगी, तब तक सार्वजनिक खुलासे से जवाबदेही सुनिश्चित करना मुश्किल बना रहेगा।
चल संपत्ति की जानकारी भी सार्वजनिक नहीं
एक अन्य अहम सवाल चल संपत्तियों को लेकर है। अधिकारियों को निर्धारित सीमा से अधिक मूल्य की चल संपत्तियों में हुई बढ़ोतरी की जानकारी देनी होती है, लेकिन यह विवरण सार्वजनिक नहीं होता। इसके कारण बैंक जमा, निवेश और अन्य चल संपत्तियों से जुड़ी जानकारी आम लोगों की जांच के लिए उपलब्ध नहीं रहती।
इसके विपरीत, रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने पिछले वर्ष अपनी संपत्ति का विवरण सार्वजनिक किया था। ऐसे में सरकारी अधिकारियों की संपत्ति संबंधी घोषणाओं में पारदर्शिता और जानकारी की उपलब्धता को लेकर बहस तेज हो सकती है।
संपत्ति के सत्यापन पर भी स्पष्ट जवाब नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, कैबिनेट सचिवालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) से यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि अधिकारियों की ओर से घोषित संपत्तियों का सत्यापन करने के लिए कोई नियमित व्यवस्था है या नहीं। वर्ष 2025 में जमा किए गए अधूरे विवरणों के मामले में कोई कार्रवाई हुई या नहीं, इस बारे में भी स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई।
यदि संपत्ति घोषणाओं की जांच करने वाली कोई प्रभावी व्यवस्था नहीं है, तो अधिकारी अधूरी जानकारी देकर भी नियमों का पालन करने का दावा कर सकते हैं। ऐसे में केवल विवरण सार्वजनिक करना पर्याप्त नहीं होगा। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि दी गई जानकारी सही, पूरी और जांच योग्य हो।
पारदर्शिता बढ़ाने के लिए क्या कदम जरूरी?
विशेषज्ञों और जवाबदेही की जरूरत पर जोर देने वालों के मुताबिक, संपत्ति विवरण जमा करने की ऑनलाइन व्यवस्था में क्षेत्रफल, स्थान और मौजूदा मूल्य जैसी जरूरी जानकारियों को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। अधूरी जानकारी होने पर फॉर्म जमा करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।
इसके अलावा, DoPT को हर साल कुछ संपत्ति घोषणाओं का नमूने के आधार पर सत्यापन करना चाहिए। इसके लिए जमीन के सरकारी रिकॉर्ड और अन्य उपलब्ध दस्तावेजों से जानकारी का मिलान किया जा सकता है। गलत या अधूरी जानकारी मिलने पर कार्रवाई की स्पष्ट व्यवस्था भी जरूरी है।
केंद्र सरकार को लोकपाल कानून की धारा 44 के तहत लंबित नियमों को अधिसूचित करने की दिशा में भी कदम उठाना चाहिए। इससे संपत्ति और देनदारियों के खुलासे की प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाया जा सकेगा।
लोकपाल क्या है और इसकी भूमिका क्या है?
लोकपाल केंद्र स्तर पर भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों की जांच के लिए स्थापित एक वैधानिक संस्था है। राज्यों में इसी तरह की भूमिका लोकायुक्त निभाते हैं। लोकपाल के अधिकार क्षेत्र में प्रधानमंत्री, सांसदों और केंद्र सरकार के विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारियों सहित कई सार्वजनिक पदाधिकारी आते हैं। हालांकि, प्रधानमंत्री से जुड़े मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कुछ विषयों के लिए विशेष अपवाद निर्धारित हैं।
लोकपाल को गवाहों को बुलाने और उनसे पूछताछ करने जैसी कुछ दीवानी अदालत की शक्तियां प्राप्त हैं। इसके अलावा, जिन मामलों को वह केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को भेजता है, उनमें कानून के अनुसार CBI पर उसका पर्यवेक्षण संबंधी अधिकार भी होता है।
संपत्ति का ब्योरा देना ही काफी नहीं
शीर्ष नौकरशाहों की संपत्ति का विवरण सार्वजनिक करना पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब घोषित जानकारी पूरी हो और उसका स्वतंत्र रूप से सत्यापन किया जा सके। क्षेत्रफल और मूल्य जैसी बुनियादी जानकारियों के अभाव में संपत्ति के ब्योरे की जांच करना मुश्किल है।
अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि DoPT संपत्ति घोषणाओं के सत्यापन के लिए कोई ठोस व्यवस्था बनाता है या नहीं और केंद्र सरकार लोकपाल कानून की धारा 44 से जुड़े लंबित नियमों को कब अधिसूचित करती है।