आरक्षण क्यों मांग रहा है गुजरात का पाटीदार समुदाय?

सात दिसंबर की देर शाम तक पहले चरण के लिए चुनाव प्रचार का अंत हो चुका था. हम भावनगर से जूनागढ़ की ओर जा रहे थे. रास्ते मे ही गोंडल (राजकोट जिला) बाज़ार से गुजरते हुए हमने सोचा कि चाय के लिए रुका जाये. लेकिन सामने एक पान की दुकान पर कुछ युवाओं को देखकर हमने चाय का विचार त्याग दिया और पान की दुकान की तरफ चल पड़े.

पान बनवाने के दौरान ही वहां बैठे दो युवाओं से हार्दिक पटेल द्वारा अनामत (आरक्षण) की मांग को लेकर उनके विचार जानने की कोशिश की- ‘हार्दिक पटेल जो आन्दोलन कर रहे है, क्या वह सही है?’ एक ही झटके में चार युवा (दो जिनके साथ हम बात कर रहे थे उनके अलावा एक हमारे पीछे खड़ा था और चौथा पान लगा रहा था) ने तड़ाक से जवाब दिया “बिलकुल सही है“. चारों युवा पाटीदार थे. वो बताने लगे कि हम इतना पैसा लगा कर पढाई करते हैं, परीक्षा में मार्क्स भी ज्यादा लाते है लेकिन हमें नौकरियां नहीं मिलती है. हमसे कम मार्क्स वाले को नौकरी मिल जाती है. हमें भी तो नौकरी चाहिए?

सिर्फ युवा ही नहीं हैं नाराज

सिर्फ युवा ही नहीं, भावनगर जिले के एक गाँव में ही किराना दुकान चलाने वाले 51 वर्षीय कांजी भाई पटेल का भी यही मानना था कि हार्दिक पटेल द्वारा अनामत को लेकर आन्दोलन सही है. वो आगे कहते है- “मैंने अपने बच्चे को 1.5 लाख खर्च करके इंजीनियरिंग डिप्लोमा की पढाई करवाई लेकिन उसके पास अभी कोई नौकरी नहीं है. खेती में भी कोई फायदा हो नहीं रहा है और जमीन भी छोटी होती जा रही है, उस परिस्थिति में हमारे बच्चे को नौकरी नहीं मिलेगी तो वो क्या करेगा?”

गुजरात में पटेल समुदाय की संख्या राज्य की कुल आबादी का 13-15 प्रतिशत हिस्सा माना जाता है. पाटीदार समाज को राज्य में वर्चस्व वाला माना गया है क्योंकि राज्य की राजनीति से लेकर अर्थव्यवस्था तक, उनकी काफी अहम् भागीदारी रही है. पहले पटेल जमींदारों के खेत पर काम करते थे लेकिन आजादी के बाद हुए भूमि सुधार की वजह से पटेलों के पास जमीनें आयीं. बाद में ज्यादातर लोग व्यापार में लगे और समृद्ध बने.

कड़वा और लेवा में बड़ा फर्क नहींं

पटेल समुदाय में मुख्यतः दो उपजाति हैं- कड़वा पटेल और लेवा पटेल. ऐसा माना जाता है कि कड़वा पटेल ज्यादातर कृषि में संलग्न है और लेवा पटेल के लोग व्यापार में ज्यादा हाथ आजमाते है. हार्दिक पटेल के नेतृत्व में 2015 के पाटीदार अनामत आन्दोलन के बाद और इस चुनाव से कुछ महीने पहले तक ऐसा सुनने में आता था कि हार्दिक पटेल जो कि कड़वा पटेल उपजाति से आते हैं, उनको दूसरी उपजाति लेवा पटेल का समर्थन नहीं है. इसलिए इस चुनाव में पटेल आन्दोलन का कोई विशेष असर नहीं पड़ेगा. लेकिन कांजी भाई और उनके अलावा सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात (जहाँ पटेल आबादी का घनत्व अधिक है) में अनामत आन्दोलन को लेकर विशेष अंतर्विरोध नहीं देखने को मिला.

अब सवाल यह है कि आखिर जिस समुदाय की राज्य की राजनीति और अर्थव्यवस्था में इतनी बड़ी भागीदारी है उस समुदाय को आरक्षण की जरुरत क्यों महसूस हुई? इसके अलावा एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि पटेलों में जो भी नाराजगी इस सरकार के साथ है क्या वह सिर्फ आरक्षण को लेकर ही है?

हार्दिक पटेल का आंदोलन साजिश?

पहले सवाल के जबाब में कुछ लोगो का मानना है कि हार्दिक पटेल का आन्दोलन एक राजनीतिक साजिश था जिसका मकसद राज्य सरकार को परेशानी में डालना था. लेकिन इसका एक सैद्धांतिक पहलू भी है, वो यह कि न सिर्फ गुजरात में बल्कि देश के अन्य भागों में भी रोजगार के अवसर कम हुए है और उसी दौर में शिक्षा महंगी हुई है तथा खेती सभी के लिए फायदे वाली काम नहीं रही. इस वजह से नयी पीढ़ी को खेती में कोई आकर्षण नहीं दिखता है. ऐसे में युवा जाये तो जाये कहाँ? इस दौर में जब नौकरियों की संख्या पर्याप्त नहीं है ऐसे में व्यक्ति को आरक्षण ही एक सहारा दिखता है.

बहरहाल दूसरे सवाल का जवाब समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा. 2014 तथा 2015 में मानसून में कमी की वजह से फसल की पैदावार कम हुई और किसान परेशानी में रहे. 2016 में मानसून ठीक रहा, फसल अच्छी हुई लेकिन नोटबंदी की वजह से पैसे का लेन-देन (लिक्विडिटी) कम रहा. इस वर्ष फसल की उपज ठीक रही लेकिन उन्हें फसल का सही दाम नहीं मिला. इससे किसानों का रोष और बढ़ गया. राज्य में उच्च आय वर्ग के किसानों में ज्यादातर किसान पटेल हैं खासकर सौराष्ट्र के इलाके में.

व्यापारी भी परेशान

किसानों के अलावा GST की वजह से व्यापारी वर्ग में भी एक रोष पनपा. सूरत में व्यापारियों ने सार्वजनिक रूप से विरोध भी प्रकट किया. सूरत के ही होटल व्यवसायी हंसमुख भाई पटेल का कहना है कि एक के बाद एक नोटबंदी और GST ने बाज़ार को मंदा कर दिया जिससे उनका बहुत नुकसान हुआ. राज्य के व्यापार में पटेल अग्रणी रहे हैं (खासकर सूरत के व्यवसायी पटेल ज्यादातर मोरबी, भावनगर, अमरेली आदि जिलों और मध्य गुजरात के जिलों से हैं)।

युवाओं में बेरोजगारी, किसानों को सही भाव का नहीं मिलना और व्यापार में नुकसान के बाद पटेलों को भावनात्मक रूप से 25 अगस्त 2015 को अहमदाबाद के GMDC मैदान में हुई पुलिस करवाई से और ज्यादा चोट पहुंची, जिसमे 14 पाटीदार नौजवानों की मृत्यु हो गयी थी. इस वजह से पाटीदारों में वर्तमान सरकार को सबक सिखाने का भाव दिखता है क्योंकि उनका मानना है कि इस सरकार में अहंकार पैदा हो गया है. लेकिन एक बात और साफ दिखती है कि नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत छवि को लेकर उनमें ज्यादा संशय नहीं है। अब देखना यह है कि इस चुनाव में पाटीदार अपनी नाराजगी को वोट से जाहिर करते हैं या नहीं.