नई दिल्ली. भारत में ड्रोन सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है। रक्षा, लॉजिस्टिक्स, कृषि, औद्योगिक निरीक्षण, निगरानी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में ड्रोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल देश में ड्रोन असेंबल कर लेना ही आत्मनिर्भरता नहीं कहलाएगा। असली सवाल यह है कि ड्रोन को चलाने वाली महत्वपूर्ण तकनीकों और सब-कॉम्पोनेंट्स पर भारत का कितना नियंत्रण है।
आयातित पुर्जों पर निर्भरता बनी बड़ी चिंता
विशेषज्ञों के अनुसार, अगर ड्रोन का फ्लाइट कंट्रोलर, कम्युनिकेशन सिस्टम, प्रोपल्शन यूनिट, नेविगेशन मॉड्यूल, बैटरी, सेंसर, फर्मवेयर या एन्क्रिप्शन सिस्टम विदेशों से आयात किए जा रहे हैं, तो संवेदनशील तकनीक के स्तर पर निर्भरता बनी रहती है। मौजूदा भू-राजनीतिक माहौल में यह स्थिति सप्लाई चेन, साइबर सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए खतरा मानी जा रही है।
आधुनिक युद्ध में ड्रोन की बढ़ती भूमिका
आज के दौर में युद्ध तेजी से ड्रोन-केंद्रित होता जा रहा है। ISR प्लेटफॉर्म, लॉइटरिंग म्यूनिशन, स्वॉर्म ड्रोन, लॉजिस्टिक्स ड्रोन और काउंटर-ड्रोन सिस्टम रक्षा तैयारियों का अहम हिस्सा बन चुके हैं। ऐसे में फ्लाइट कंट्रोलर, सुरक्षित डेटा लिंक, एंटी-जैम नेविगेशन सिस्टम, प्रोपल्शन तकनीक और मिशन सॉफ्टवेयर जैसे महत्वपूर्ण कॉम्पोनेंट्स पर स्वदेशी नियंत्रण बेहद जरूरी माना जा रहा है।
चीन पर निर्भरता से बढ़ी सुरक्षा चिंता
ड्रोन उद्योग में चीन से आयातित पुर्जों पर भारत की निर्भरता अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। BonV Aero के को-फाउंडर और CEO सत्यब्रत सतपथी का कहना है कि वास्तविक आत्मनिर्भरता तभी संभव है जब भारत सिलिकॉन चिप से लेकर अंतिम असेंबली तक पूरी वैल्यू चेन पर नियंत्रण हासिल करे।
लोकसभा में सरकार ने क्या बताया?
अप्रैल 2025 में नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने लोकसभा में जानकारी दी
DGCA-प्रमाणित छोटे ड्रोन में इस्तेमाल होने वाले करीब 39% फ्लाइट कंट्रोलर चीन से आए
फ्लाइट कंट्रोलर को ड्रोन का “दिमाग” माना जाता है
यही सिस्टम उड़ान, पेलोड और मिशन कंट्रोल संभालता है
विशेषज्ञों ने बताए कई बड़े खतरे
- सप्लाई चेन बाधित होने का जोखिम
चीन ने 2023 में फ्लाइट कंट्रोलर और लंबी दूरी वाले UAV पर एक्सपोर्ट कंट्रोल सख्त किए थे, जिससे रक्षा खरीद में देरी हुई।
- साइबर सुरक्षा और जासूसी का खतरा
विदेशी फर्मवेयर और हार्डवेयर के जरिए डेटा लीक या निगरानी की आशंका बनी रहती है। इसी वजह से आर्मी डिजाइन ब्यूरो (ADB) ने ऐसा फ्रेमवर्क तैयार किया है जिसमें रक्षा ड्रोन में चीनी कॉम्पोनेंट्स पर रोक लगाने की तैयारी है। इसे आगामी Defence Acquisition Procedure (DAP) 2026 का हिस्सा बनाया जा सकता है।
- कीमतों में अस्थिरता
ड्रोन मोटर में इस्तेमाल होने वाले रेयर अर्थ मैग्नेट की कीमतें चीन के एक्सपोर्ट प्रतिबंधों के बाद तेजी से बढ़ीं, जिससे निर्माण लागत और रक्षा बजट प्रभावित हुआ।
सरकार ने शुरू किए बड़े कदम
भारत सरकार आयात पर निर्भरता कम करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए कई योजनाएं चला रही है।
Drone Shakti Mission
जनवरी 2026 में लॉन्च
कुल निवेश: 1,800 करोड़ रुपये
500–600 करोड़ रुपये रिसर्च एंड डेवलपमेंट के लिए
1,000–1,200 करोड़ रुपये कॉम्पोनेंट मैन्युफैक्चरिंग प्रोत्साहन के लिए
PLI Scheme for Drones
कुल बजट: 120 करोड़ रुपये
वैल्यू एडिशन पर 20% प्रोत्साहन
प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार कार्यालय ने भी स्पष्ट किया है कि Drone Shakti Mission का फोकस केवल ड्रोन असेंबली नहीं बल्कि ड्रोन कॉम्पोनेंट्स के घरेलू निर्माण पर होगा।
‘असेंबली मॉडल से आगे बढ़ना होगा’
AKSI Aerospace Group के ग्रुप मैनेजिंग डायरेक्टर पंकज अकुला का कहना है कि भारत को केवल असेंबली आधारित इकोसिस्टम से आगे बढ़कर गहरी इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करनी होगी।
उन्होंने कहा कि स्वदेशी सब-सिस्टम, एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और विशेषीकृत इकाइयों के जरिए भारत सुरक्षित और भरोसेमंद ड्रोन क्षमता विकसित कर सकता है।
भारत को किन तीन क्षेत्रों पर करना होगा फोकस?
सत्यब्रत सतपथी के मुताबिक भारत को ड्रोन क्षेत्र में संप्रभु क्षमता हासिल करने के लिए तीन अहम क्षेत्रों पर काम करना होगा।
जरूरी फोकस एरिया
सेमीकंडक्टर और सेंसर निर्माण
IRNSS आधारित स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम
घरेलू एन्क्रिप्टेड कम्युनिकेशन मॉड्यूल
‘ड्रोन संप्रभुता अब विकल्प नहीं’
सत्यब्रत सतपथी ने चेतावनी देते हुए कहा कि चीन पर लगातार निर्भरता भारत की रणनीतिक कमजोरी को बढ़ा रही है।
उन्होंने कहा,
“आत्मनिर्भरता केवल भारत में ड्रोन असेंबल करने तक सीमित नहीं हो सकती। असली आत्मनिर्भरता तब होगी जब भारतीय रक्षा बल पूरी तरह भरोसे के साथ ऐसे ड्रोन इस्तेमाल करें जिन्हें कोई विदेशी शक्ति सप्लाई चेन के जरिए प्रभावित, ट्रैक या बंद न कर सके।”
विशेषज्ञों का मानना है कि ड्रोन तकनीक में आत्मनिर्भरता केवल निर्माण का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, साइबर भरोसे, आर्थिक विकास, सप्लाई चेन मजबूती और वैश्विक एयरोस्पेस क्षमता से जुड़ा रणनीतिक विषय बन चुका है। ऐसे में भारत के लिए अब असेंबली से आगे बढ़कर पूरी ड्रोन तकनीक पर नियंत्रण स्थापित करना बेहद जरूरी माना जा रहा है।

