नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मुकदमे की सुनवाई शुरू होने से पहले किसी आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखना ऐसी स्थिति में नहीं बदलना चाहिए, जहां उसे बिना ट्रायल के ही सजा भुगतनी पड़े। अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों वाले मामलों में भी आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के अधिकार की रक्षा जरूरी है। ये अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आते हैं।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने राजस्थान में जल जीवन मिशन के तहत टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं से जुड़े भ्रष्टाचार मामले में पूर्व कांग्रेस मंत्री महेश चंद्र जोशी और मुकेश पाठक को नियमित जमानत देते हुए यह टिप्पणी की।
गंभीर आरोपों के आधार पर अनिश्चितकालीन हिरासत उचित नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जल जीवन मिशन जैसी जनकल्याणकारी योजना के क्रियान्वयन में बड़े पैमाने पर कथित वित्तीय गड़बड़ी और संस्थागत मिलीभगत के आरोप गंभीर हैं। ऐसे मामलों की गहन जांच जरूरी है और राज्य सरकार को आरोपियों की जमानत का विरोध करने का अधिकार है।
हालांकि, पीठ ने कहा कि आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, केवल उनकी गंभीरता के आधार पर जमानत से जुड़े अन्य पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। गंभीर आरोप किसी व्यक्ति को अनिश्चितकाल तक मुकदमे से पहले हिरासत में रखने का अपने आप में पर्याप्त आधार नहीं बन सकते।
अदालत ने दोहराया कि लंबी प्री-ट्रायल हिरासत को बिना सुनवाई के सजा में तब्दील होने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसा करना आरोपी के व्यक्तिगत स्वतंत्रता और शीघ्र सुनवाई के मौलिक अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
जांच पूरी, चार्जशीट दाखिल होने को भी माना अहम आधार
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि दोनों आरोपियों के खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। अभियोजन का मामला मुख्य रूप से दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर आधारित है।
इन साक्ष्यों में टेंडर से संबंधित फाइलें, सरकारी पत्राचार, बैंक स्टेटमेंट, जब्त मोबाइल फोन की फॉरेंसिक रिपोर्ट और इंटरसेप्ट की गई बातचीत शामिल हैं। अदालत ने ध्यान दिया कि ये सभी साक्ष्य पहले से जांच एजेंसी के कब्जे में हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक, आरोपियों से अब आगे हिरासत में पूछताछ करने या कोई बरामदगी कराने की जरूरत नहीं थी। दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका भी काफी हद तक कम हो गई थी।
महेश चंद्र जोशी पांच महीने से अधिक समय से थे जेल में
अदालत ने दोनों आरोपियों की हिरासत की अवधि को भी जमानत पर विचार करते समय महत्वपूर्ण माना। करीब 72 वर्षीय महेश चंद्र जोशी 7 मई 2026 से इस मामले में जेल में बंद थे। उनकी हिरासत की अवधि पांच महीने से अधिक हो चुकी थी।
वहीं, मुकेश पाठक 18 फरवरी 2026 से लगातार हिरासत में थे और उनकी जेल में रहने की अवधि करीब आठ महीने हो गई थी।
पीठ ने इन परिस्थितियों को मामले की अन्य स्थितियों के साथ देखते हुए विचार किया कि आरोपियों को आगे भी जेल में रखना आवश्यक है या नहीं।
22 आरोपी, 124 गवाह और 20 हजार पन्नों के दस्तावेज
सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे के संभावित रूप से लंबा चलने की आशंका को भी अहम माना। मामले में कुल 22 आरोपी हैं और अभियोजन की ओर से तीन चार्जशीट दाखिल की गई हैं। इसके अलावा, 124 गवाहों और करीब 20,000 पन्नों में फैले 192 दस्तावेजों का उल्लेख किया गया।
अदालत ने कहा कि अभी तक आरोप तय नहीं हुए थे और ट्रायल भी शुरू नहीं हुआ था। कुछ सह-आरोपियों की कथित भूमिका की जांच अभी जारी थी, जबकि गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बावजूद कई अन्य आरोपी फरार थे।
मामले में साक्ष्यों की बड़ी संख्या और अन्य परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने कहा कि मुकदमे के निपटारे में काफी समय लग सकता है। ऐसे में सुनवाई शुरू होने से पहले आरोपियों को लगातार हिरासत में रखना जमानत के फैसले में विचार करने योग्य महत्वपूर्ण पहलू था।
सह-आरोपियों को मिली राहत का भी लिया संज्ञान
पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि दोनों आरोपियों को इसी तथ्यात्मक घटनाक्रम से जुड़े अन्य मामलों में जमानत मिल चुकी थी। मौजूदा मामले के कई सह-आरोपियों को भी जमानत या अंतरिम राहत दी गई थी।
सभी परिस्थितियों पर समग्र रूप से विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपियों को और समय तक मुकदमे से पहले हिरासत में रखना न तो उचित है और न ही आवश्यक। अभियोजन पक्ष की वैध चिंताओं को जमानत पर उपयुक्त शर्तें लगाकर सुरक्षित किया जा सकता है।
इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत पर विचार करते समय आरोपों की गंभीरता के साथ-साथ हिरासत की अवधि, जांच की स्थिति, उपलब्ध साक्ष्य और मुकदमे के पूरा होने में लगने वाले संभावित समय को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
