नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्पष्ट कर दिया कि हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति से जुड़े कॉलेजियम के फैसले न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आते। अदालत ने कहा कि कॉलेजियम की सिफारिशें उसके ‘व्यक्तिपरक संतोष’ (Subjective Satisfaction) पर आधारित होती हैं और न्यायिक पक्ष से अदालत इन मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई, जिसमें हिमाचल प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी ने हाई कोर्ट में न्यायाधीश नियुक्ति की कॉलेजियम प्रक्रिया को चुनौती दी थी।
वरिष्ठता के बावजूद नाम नहीं आने पर दाखिल की थी याचिका
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति BV Nagarathna और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi की पीठ ने की। याचिकाकर्ता अरविंद मल्होत्रा, जो धर्मशाला में पारिवारिक न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश हैं, ने दावा किया था कि वह राज्य के सबसे वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों में शामिल हैं। इसके बावजूद हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में न्यायाधीश पद के लिए उनके जूनियर अधिकारियों के नाम कॉलेजियम द्वारा आगे बढ़ा दिए गए, जबकि उनका नाम नजरअंदाज कर दिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बलबीर सिंह ने दलील दी कि मल्होत्रा ने चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया था और सभी आवश्यक दस्तावेज भी जमा किए थे, लेकिन अंततः उनके जूनियर अधिकारियों को नियुक्ति के लिए अनुशंसित कर दिया गया।
कॉलेजियम को निर्देश नहीं दे सकती अदालत
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि अदालत कॉलेजियम को यह निर्देश नहीं दे सकती कि किस व्यक्ति के नाम पर विचार किया जाए या किसे नियुक्ति के लिए सिफारिश की जाए।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि यह पूरी तरह कॉलेजियम के विवेक और संतोष का विषय है। अदालत न्यायिक पक्ष से कॉलेजियम को यह नहीं कह सकती कि वह किसी विशेष व्यक्ति के नाम पर विचार करे या उसे नियुक्ति के लिए चुने।
वरिष्ठता से नियुक्ति का अधिकार नहीं बनता
पीठ ने यह भी कहा कि केवल वरिष्ठता के आधार पर किसी न्यायिक अधिकारी को हाई कोर्ट का न्यायाधीश बनाए जाने का अधिकार नहीं मिल जाता। वरिष्ठ होना नियुक्ति की गारंटी नहीं है और कॉलेजियम विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया गया है। न्यायालय ने संकेत दिया कि संभव है उनका नाम अभी भी विचाराधीन हो।
कॉलेजियम की गोपनीय प्रक्रिया पर भी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजियम की आंतरिक चर्चाओं की गोपनीयता पर भी जोर दिया। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि अदालत हाई कोर्ट कॉलेजियम या सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की आंतरिक विचार-विमर्श प्रक्रिया की जांच कर “पैंडोरा बॉक्स” नहीं खोलना चाहती।
वहीं न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची ने कहा कि हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशों को पहले ही सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की मंजूरी मिल चुकी है। ऐसे में चयन प्रक्रिया के शुरुआती चरणों की न्यायिक जांच करना और भी कठिन हो जाता है।
याचिका वापस, अन्य ऑप्शन खुले
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों के बाद याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका पर जोर नहीं दिया और प्रशासनिक स्तर पर सक्षम प्राधिकरण के समक्ष अन्य उपाय अपनाने की अनुमति मांगी।
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना याचिका का निपटारा कर दिया।
क्या है इस फैसले का महत्व?
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी न्यायपालिका में नियुक्तियों की कॉलेजियम प्रणाली को लेकर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि जजों की नियुक्ति और पदोन्नति से जुड़े कॉलेजियम के निर्णय मुख्य रूप से उसकी स्वतंत्र और गोपनीय प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा सामान्य परिस्थितियों में इनकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।

