नई दिल्ली. Supreme Court ने जस्टिस यशवंत वर्मा की उस याचिका पर सुनवाई की जिसमें उन्होंने अपने सरकारी आवास से नकदी बरामदगी के बाद उनके खिलाफ शुरू की गई Internal Inquiry की वैधता को चुनौती दी है।
Justices Dipankar Datta और AG Masih की बेंच ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि यदि भारत के Chief Justice (CJI) के पास किसी Judge के Misconduct से संबंधित ठोस जानकारी है, तो वे इसकी सूचना President और Prime Minister of India को दे सकते हैं।
पीठ ने वकील कपिल सिब्बल से यह भी सवाल किया कि यदि वर्मा को आंतरिक जांच समिति की वैधता पर आपत्ति थी, तो वे उसी समय Supreme Court क्यों नहीं पहुंचे? Bench ने पूछा, “जब आपको समिति की प्रक्रिया पर विश्वास नहीं था, तब आपने उसमें भाग क्यों लिया?”
Kapil Sibal ने कही ये बात
Kapil Sibal ने दलील दी कि आंतरिक समिति की सिफारिश असंवैधानिक है और यह Article 14 (Right to Equality) का उल्लंघन करती है। उन्होंने तर्क दिया कि न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया केवल Article 124(4) और 124(5) के तहत ही हो सकती है, और Internal Committee केवल CJI को administrative advice देने के लिए होती है।
Bench ने इस पर कहा कि अगर Internal Procedure Judge Ayyar मामले से जुड़ी है तो इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। Bench यह जानना चाहती है कि यदि अदालत याचिकाकर्ता के पक्ष में जाती है तो उसे किस प्रकार की राहत दी जा सकती है।
Judges Protection Act की भी चर्चा हुई, जिसमें न्यायाधीशों के लिए कानूनी सुरक्षा की परिभाषा और दायरा तय किया गया है। कोर्ट ने Section 3(1) और 3(2) को पढ़ने को कहा ताकि यह स्पष्ट हो सके कि आंतरिक जांच की प्रक्रिया में किस सीमा तक हस्तक्षेप हो सकता है।
